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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 899

दिशमास्थाय कैकेयि दक्षिणां दण्डकान् प्रति ।
वैजयन्तमिति ख्यातं पुरं यत्र तिमिध्वजः ॥
स शम्बर इति ख्यातः शतमायो महासुरः ।
ददौ शक्रस्य संग्रामं देवसंघैरनिन्दितः ॥
तस्मिन् महति संग्रामे पुरुषान् क्षतविक्षतान् ।
रात्रौ प्रसुप्तान् घ्नन्ति स्म तरसापास्य राक्षसाः ॥
तत्राकरोन्महायुद्धं राजा दशरथस्तदा ।
असुरैश्च महाबाहुः शस्त्रैश्च शकलीकृतः ॥
अपवाह्य त्वया देवि संग्रामाद्भ्रष्टचेतनः ।
तत्रापि विक्षतः शस्त्रैः पतिस्ते रक्षितस्त्वया ॥
तुष्टेन तेन दत्तौ ते द्वौ वरौ शुभदर्शने ।
स त्वयोक्तः पतिर्देवि यदिच्छेयं तदा वरम् ॥
गृह्णीयां तु तदा भर्तस्तथेत्युक्तं महात्मना ।
अनभिज्ञो ह्यहं देवि त्वयैव कथितं पुरा ॥” (वा० रा० २।९।११-१८)
“यौ तौ देवासुरे युद्धे वरौ दशरथो ददौ ।
तौ स्मारय महाभागे सोऽर्थो न त्वाक्रमेदिति ॥” (वा० रा० २।९।२८)
उपर्युक्त वचनों के अनुसार स्पष्ट प्रतीत होता है कि महाराज चक्रवर्तीजी कभी इन्द्र की सहायता के लिए
देवासुर संग्राम में सम्मिलित होकर असुरों से युद्ध कर रहे थे । महाराज कैकेयी को साथ ले गये थे । वहाँ वैजयन्तपुर
में महामायावी शम्बरासुर से युद्ध था । उस महान् संग्राम में राक्षस लोग प्रसुप्त पुरुषों को क्षत-विक्षत कर देते थे ।
उस भीषण युद्ध में असुरों ने महाराज को नानाविध प्रभावशाली शस्त्रास्त्रों से क्षत-विक्षत कर दिया था। उस समय
महारानी कैकेयी ने स्वयं रथचालन कर महाराज की रक्षा की थी। उस प्रसन्नता में महाराज ने उन्हें दो वर
माँगने को कहा था । महारानी ने कहा था कि जब मेरी इच्छा होगी तब इन वरों को माँग लूँगी ।
मन्थरा ने श्रीराम के यौवराज्याभिषेक-काल में महारानी को याद दिलाकर एक से श्रीराम को वनवास
और दूसरे से श्रीभरत को राज्य प्रदान का वर माँगने को कहा था । श्रीराम ने भी चित्रकूट में श्रीभरत को
बतलाया था कि—
“देवासुरे च संग्रामे जनन्यै तव पार्थिवः ।
संप्रहृष्टो ददौ राजा वरमाराधितः पुरा ॥” (वा० रा० २।१०७।४)
श्रीराम भगवान् ने भरत को यह भी बतलाया था कि कैकेयी के पिता ने कैकेयी का विवाह महाराज के
साथ इसी शर्त पर किया था कि इससे जो पुत्र होगा वही राज्य का भागी होगा ।
कौशल्या आदि किसी को पुत्र नहीं था, इसलिए महाराज ने भी वैसा स्वीकार कर लिया था—
“पुरा भ्रातः पिता नः स मातरं ते समुद्वहन् ।
मातामहे समाश्रौषीद्राज्यशुल्कमनुत्तमम् ॥” (वा० रा० २।१०७।३)
“भवानपि तथेत्येव पितरं सत्यवादि..म् ।
कर्तुमर्हसि धर्मज्ञ क्षिप्रमेवाभिषेचनात् ॥
ऋणान्मोचय राजानं मत्कृतं भरत प्रभुम् ।
पितरं त्राहि धर्मज्ञ.... .... .... .... ॥” (वा० रा० २।१०७।९,१०)