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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 624

अध्याय युद्धकाण्ड ५४७

अग्निवेश्यरामायण के अनुसार मार्गशुक्ल दशमी को सीता लङ्का में लायी गयी। दशवें मास में सम्पाति
ने वानरों को उनका समाचार बताया। ११वें दिन महेन्द्र पर्वत से कूदकर हनुमान् १०० योजन समुद्र पारकर लङ्का
गये। उसी दिन रात को सीता का दर्शन हुआ। द्वादशी को शिंशपा में हनुमान् स्थित रहे। उसी रात्रि को सीता
से वार्तालाप हुआ। त्रयोदशी को अक्षकुमार का वध हुआ। चतुर्दशी को इन्द्रजित् के ब्रह्मास्त्र से बन्धन हुआ।
चतुर्दशी को लङ्कादाह हुआ। सप्तमी को लौटकर राम को प्रत्यभिज्ञान दिया। अष्टमी उत्तराफाल्गुनी में अभिजित्
मुहूर्त में लङ्का के लिए राम का प्रस्थान हुआ। सातवें दिन में समुद्र के तीर पर सेनानिवेश हुआ। पौषशुक्ल प्रति-
पदा से ४ दिन तक समुद्र के प्रति प्रायोपवेशन, १० मी से १३शी तक सेतुबन्ध, चतुर्दशी को सुवेलारोहण, पूर्णमासी
से द्वितीया तक सैन्यतारण, ३या से १० मी० तक मन्त्रणा, माघशुक्ल १२शी को सारण ने सेना की संख्या की, फिर
सारण ने वानरों के सारासार का वर्णन किया।
ययावथाङ्गदो दौत्यं माघशुक्लादिवासरे।
माघशुक्लद्वितीयादिदिनैः सप्तभिरेव तु ॥
रक्षसां वानराणां तु युद्धमासीत् सुदारुणम् ।
माघशुक्लनवम्यां तु रात्राविन्द्रजिता रणे ॥
रामलक्ष्मणयोर्नागपाशैर्बन्धो बभूव ह।
नागपाशविमोक्षार्थं दशम्यां गरुडोऽभ्यगात् ॥
अत्रावहारः कथितः दशम्यादिदिनद्वयम् ।
द्वादश्यामाञ्जनेयेन धूम्राक्षस्य वधः कृतः॥
त्रयोदश्यां तु तेनैव निहतोऽकम्पनो रणे।
माघशुक्लचतुर्दश्यां यावत् कृष्णादिवासरम् ॥
त्रिदिनेन प्रहस्तस्य नीलेन विहितो वधः।
माघासितद्वितीयायाश्चतुर्थ्यन्तं त्रिभिर्दिनैः ॥
रामेण तुमुले युद्धे रावणो द्रावितो रणात्।
पञ्चम्यास्त्वष्टमीं यावद् रावणेन प्रबोधितः॥
कुम्भकर्णः समुत्तस्थावत्रायुद्ध्यच्चतुर्दिनम् ।
कुम्भकर्णो दिनैः षड्भिर्नवम्यास्तु चतुर्दशीम् ॥
रामेण निहतो युद्धे बहुवानरभक्षकः ।
अमावस्या दिने शोकादवहारो बभूव ह॥
फाल्गुनादिप्रतिपदश्चतुर्थ्यन्तदिने नरान्तकप्रभृतयः
पञ्च राक्षसा हताः। पञ्चम्याः सप्तमीं
यावदतिकायो हतः। अष्टम्या द्वादशीं यावत्
निकुम्भकुम्भावूध्वं मकराक्षश्चतुर्दिनैः ।
फाल्गुनकृष्णद्वितीयायां शक्रजिता जितम्।
ततः पञ्च दिनान्यवहारः। त्रयोदशीमारभ्य
षड्भिर्दिनैः लक्ष्मणेनेन्द्रजित् हतः।
अमावस्यां ययौ वीरः युद्धाय दशकन्धरः ॥
चैत्रशुक्लप्रतिपदः पञ्चमीं दिनपञ्चकैः।
रावणस्य प्रधानानां युद्ध्यतामभवत् क्षयः॥