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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 505

४२८ रामायणमीमांसा त्रयोदश
नहीं है। लोक में कोई व्यक्ति पुत्र-प्राप्ति के लिए अनेक महात्माओं और अनेक देवताओं की सेवा करता है, अनेक
व्रत और अनेक तपस्याएँ भी करता है सभी की कृपा का फल एक हो सकता है। इसी प्रकार जलन्धर रावण हुआ
या हरगण रावण और कुम्भकर्ण हुए या जय और विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए, इस सम्बन्ध में कल्पभेद से समाधान
सम्भव है। रामचरितमानस का भानुप्रताप भी कल्पभेद से रावण हुआ था। शापवश जय और विजय के तीन जन्म
होने प्रसिद्ध हैं। जैसे अनेक सात्त्विकी शक्तियों का विष्णु एवं सीता में सायुज्य सम्भव है वैसे ही अनेक राजस और
तामस शक्तियों का रावण में भी सायुज्य सम्भव ही है अर्थात् जब जय-विजय रावण-कुम्भकर्ण हुए तब उन्हीं में
जलन्धर, भानुप्रताप और उनके साथियों का सम्मिलितरूप से अवतार मानना श्रुतार्थापत्ति प्रमाण सम्मत ही है।
“पीनोऽयं देवदत्तो दिवा न भुङ्क्ते” यहाँ दिवा भोजन न करके भी दृष्ट पीनता की उपपत्ति के लिए जैसे अर्थापत्ति
द्वारा रात्रिभोजन की कल्पना होती है वैसे ही प्रामाणिक श्रुत अर्थ की उपपत्ति के लिए भी उपपादक की कल्पना की
जाती है। उक्त पुराणादि भारतीय परम्परा में परम प्रामाणिक हैं ही। उनके लेखक व्यास सर्वज्ञकल्प थे, अतः उनकी
रचनाओं में भविष्य वृत्तों का वर्णन भी हुआ है। किसी अर्वाचीन घटना के वर्णनमात्र से पुराणों की
अर्वाचीनता नहीं सिद्ध हो जाती है। अद्भुतरामायण के अनुसार लक्ष्मी की परिचारिकाओं द्वारा नारद का
अपमान हुआ था, अतः नारद के शाप के अनुसार राक्षसों के यहाँ लक्ष्मी के जन्म लेने की कथा का भी समन्वय हो
जाता है, क्योंकि सीता की अन्य शक्तियों के समान ही लक्ष्मी का भी अभेद है।
नारद
श्रीबुल्के के अनुसार “प्रामाणिक वाल्मीकिरामायण में नारद का उल्लेख नहीं था, किन्तु परवर्ती प्रचलित
रामायण से लेकर परवर्ती राम-कथाओं की यह विशेषता है कि उनमें नारद का महत्त्व बढ़ता गया है।” परन्तु यह
उनका नितान्त विभ्रम है। उनका प्रामाणिक रामायण ही वस्तुतः अप्रामाणिक है, क्योंकि उसका नाम निशान
आज तक दुनियाँ में कहीं नहीं है। वर्तमान परम्पराप्राप्त वाल्मीकिरामायण ही प्रामाणिक रामायण है। इसी पर
तीर्थ, कतक, भूषण, रामाभिरामी आदि प्रामाणिक टीकाएँ हैं। आस्तिक लोग इसी का पाठ करते हैं। बुल्के के
सभी तर्क निःसार हैं। उनके अनुसार बालकाण्ड तथा उत्तरकाण्ड दोनों ही अप्रामाणिक रामायण हैं। पाँच काण्डों में
भी अवतारवर्णन तथा सीता को लक्ष्मी बतलानेवाले सब अंश प्रक्षेप ही हैं। उनकी प्रामाणिक रामायण उनके सिवा
किसी भी आस्तिक को मान्य नहीं है। वर्तमान रामायण का प्रथम सर्ग मूलरामायण के नाम से प्रसिद्ध है।
वह वाल्मीकि-नारद-संवादरूप है। बुल्के की भ्रान्त दृष्टि में वह सब प्रक्षेप ही है। उत्तरकाण्ड की नारद-सम्बन्धित
कथाओं को भी प्रक्षेप कहना भ्रान्ति ही है। (वा० रा० ७ । सर्ग २०,२१) के अनुसार नारद ने रावण को यम पर
आक्रमण करने को उकसाया नहीं, किन्तु मनुष्यलोक को बाधित नहीं करना चाहिए। देव, दानव, दैत्य, यक्ष, गन्धर्व
तथा राक्षसों द्वारा तुम अवध्य हो, तुम्हें मनुष्य-लोक को क्लेश नहीं पहुँचाना चाहिए। सदा ही श्रेयःप्राप्ति में संमूढ़,
नाना प्रकार के बड़े-बड़े दुःखों तथा बुढ़ापा एवं विविध व्याधियों से पीड़ित, सदा ही अनिष्टों से पूर्ण, क्षुधा-पिपासा
से एवं विषाद-शोक से व्याप्त मनुष्यलोक को मत सताओ। यदि तुम्हें लड़ना ही है तो यम पर आक्रमण करो,
क्योंकि अन्त में सबको ही यम के वश में होना पड़ता है। यम के जीत लेने से सबपर विजय अपने आप हो जायगी।
“किमर्थं वध्यते तात त्वयाऽवध्येन दैवतैः ।
हत एव ह्ययं लोको यदा मृत्युवशं गतः ॥
देवदानवदैत्यानां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ।
अवध्येन त्वया लोकः क्लेष्टुं योग्यो न मानुषः ॥
नित्यं श्रेयसि संमूढं महद्भिर्व्यसनैर्वृतम् ।
हन्यात् कस्तादृशं लोकं जराव्याधिशतैर्युतम् ॥” (वा० रा० ७।२०।७-९) ।