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रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished1,049 पृष्ठ

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पृष्ठ 504

है। साथ ही पतिव्रता विष्णु ( ईश्वर ) को भी अपने शाप से पाषाण बना सकती है, अतः उसके साथ छल करना
महान् पाप है। जब विष्णु भी छल से पत्थर हो सकते हैं तब अन्य जीवों की तो बात ही क्या है ? उन्हें तो उससे भी
कितना भीषण और अधिक दुःख भोगना पड़ेगा ।
बुल्के नारद-शाप को भी अर्वाचीन बनाने का साहस करते हुए कहते हैं—‘‘नारद के मोह तथा विष्णु के
प्रति उनके शाप की कथा अर्वाचीन है’’, किन्तु उक्त कथा के तत्त्व प्राचीन साहित्य में मिलते हैं। महाभारत में नारद
और पर्वत का अनेक स्थलों में उल्लेख है। नारद और पर्वत परस्पर मातुल और भागिनेय हैं ( म० भा०
१२।३०।५) । शान्तिपर्व में दोनों सृञ्जय के यहाँ पहुँचते हैं। उसकी पुत्री के सम्बन्ध से दोनों एक दूसरे को शाप
देते हैं। नारद पर्वत की स्वर्गगति रोक देते हैं एवं पर्वत के शापानुसार नारद सृञ्जय की पुत्री से विवाह कर वानर
मुखवाले हो जाते हैं, किन्तु बाद में दोनों मिलकर एक दूसरे को शापमुक्त करते हैं ( म० भा० १२।३०,३१) ।
समन्वय की दृष्टि से उक्त कथाओं के प्रसिद्ध नारद भागवत के अनुसार विष्णु के सूर्य-वंश में राम के रूप में जन्म