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सर्वकोश
रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

रामायण मीमांसा (स्वामी करपात्री जी महाराज - रामायण दार्शनिक महाग्रन्थ एवं सम्पूर्ण चरित्र-मीमांसा)

Ramayana Mimamsa of Swami Karpatri Maharaj

धर्मसम्राट् स्वामी करपात्री जी महाराज द्वारा

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पृष्ठ 356

अध्याय अवतार-सामग्री २७९
कौर्मं मात्स्यं गारुडञ्च वायवीयमनन्तरम् ।
अष्टादशं समुद्दिष्टं ब्रह्माण्डमिति संज्ञितम् ॥
अन्यान्युपपुराणानि मुनिभिः कथितानि तु ।
अष्टादशपुराणानि श्रुत्वा संक्षेपतो द्विजाः ॥
आद्यं सनत्कुमारोक्तं नारसिंहमतः परम् ।
तृतीयं स्कान्दमुद्दिष्टं कुमारेण तु भाषितम् ॥
चतुर्थं शिवधर्माख्यं साक्षान्नन्दीशभाषितम् ।
दुर्वाससोक्तमाश्चर्यं नारदीयमतः परम् ॥
कापिलं मानवं चैव तथैवोशनसेरितम् ।
ब्रह्माण्डं वारुणं चैव कालिकाद्वयमेव च ॥
माहेश्वरं तथा साम्बं सौरं सर्वार्थसञ्चयम् ।
पराशरोक्तं मारीचं तथैव भार्गवाह्वयम् ॥
( कू० पु० पूर्वार्ध १।१२-२० )
सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित ये पाँच लक्षण जिसमें हों वही पञ्चलक्षण पुराण है । इस
सूची में ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, भविष्य, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, ब्रह्मवैवर्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द,
वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुड़ और ब्रह्माण्ड ये १८ पुराण वर्णित है ।
सनत्कुमार, नारसिंह, स्कान्द, ( यह पूर्वोक्त स्कान्द से भिन्न है ), शिवधर्म, दुर्वासाप्रोक्त आश्चर्यपुराण,
नारदीय ( यह भी पूर्वोक्त से अन्य है ), कापिल, मानव, औशनस, ब्रह्माण्ड, वारुण, कालिका, माहेश्वर, साम्ब और
पराशरोक्त मारीचपुराण तथा भार्गव ये उपपुराण भी आर्ष हैं । अतः इनको आधुनिक कहना सर्वथा असङ्गत है ।
धर्मकल्पद्रुम में ज्ञानानन्दजी ने अष्टादश औपपुराणों ( जो पुराणों एवं उपपुराणों से पृथक् हैं ) की चर्चा
की है और बृहद्विवेकग्रन्थ में इनका निरूपण बताया है ।
ब्रह्माण्डविवेक के तीसरे अध्याय में भी औपपुराणों की चर्चा है । वहाँ के श्लोक उद्धृत किये जा रहे हैं—
आद्यं सनत्कुमारं च नारदीयं बृहच्च यत् ।
आदित्यं मानवं प्रोक्तं नन्दिकेश्वरमेव च ॥
कौर्मं भागवतं ज्ञेयं वासिष्ठं भार्गवं तथा ।
मुद्गलं कल्किदेव्यौ च महाभागवतं ततः ॥
बृहद्धर्मं परानन्दं वह्नि पशुपतिं तथा ।
हरिवंशं ततो ज्ञेयमिदमौपपुराणकम् ॥
उन पुराणों के श्लोकों की संख्या भी निम्नोक्त है । स्कन्दपुराणे रेवाखण्डे--
सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च ।
वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्चलक्षणम् ॥
ब्राह्मं पुराणं तत्राद्यं संहितानां विभूषितम् ।
श्लोकानां दशासाहस्रं नानापुण्यकथायुतम् !।
( १ ब्रह्मपुराण में १०००० श्लोक )