रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतलकोमसकी । सबबंदैंत्रिकालत्रिलोकत्रिवेणिहिंकेतुत्रिविक-
मकेजसकी ॥ ३३ ॥
टी०-चतुरवदन [ ब्रह्मा ] पंचवदन [ शिव ] षटवदन [ स्वामिकार्तिक ]
सहस्रवदन [ शेष ] तिनकारिकै सहसगति कहे सहस्र प्रकारसों गाई
है अथवा सहसगति कहे सहस्रधारा सात लोक भू, अंतरिक्षादि, सात द्वीप
जंबूद्वीपादि, सात रसातल अतल, वितलादि, ॥ ३२ ॥ सेतुसम जाके मग
प्राणी भवसागर पार होत हैं तीनों देव ब्रह्मा, विष्णु, महेश, त्रिदोष वात, पित्त
कफको जो रस कहे बल है ताकी गतिको शोषती है अर्थ कफ, पित्त, वात,
दुःखद दोषकृत जो मृत्यु है तासों बचावति है ऐसी त्रिदेवनकी द्युतिहू है
बेणीहू है वेदत्रयी ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, त्रयी, परिताप आध्यात्मिक, आधि
भौतिक, आधिदैविकको तलको अधोभागको मसकी कहे दबायो है अर्थ
मठायो है ऐसी वेद मतिहू बेणीहूहै त्रिविक्रम कहे बामनजू तीनि पैगसों तीनों
लोक नाप्योहै तिन तीनि पादविक्षेपकी त्रिरूप पताकाहै ॥ ३३ ॥ ,
मू०-बिभीषण-दंडक ॥ भूतलकीवेणीसीत्रिवेणीशुभशो-
भिजतिएक कहैंसुरपुरमारेगबिभातहै । एक कहैंपूरणअनादि
जोअनंतकोउताकोयहकेशोदासरूवरूपगातहै । सबसुखकर
सबशोभाकरमेरेजानकौनोयहअद्भुतसुगंधअवदातहै । दरश
परशहूतेथिरचरजीवन कोकोटिकोटिजन्मकीकुगंधमिटिजातहै
॥ ३४ ॥ भुजंगप्रायतछंद ॥ भरद्वाजकीबाटिकारामदेखी ।
महादेवकैसीबनीचित्तलेखी ॥ सबैवृक्षमंदारहूतेभलेहैं । छहू
कालकेफूलफूलेफलेहैं ॥ ३५ ॥ कहूंहंसिनीहंससोंचित्तचोरैं।
चुनैओसकेबुंदमुक्तानिभोरैं ॥ शुकालीकहूँसारिकालीविराजैं।
पठैवेदमंत्रावलीभेदसाजैं ॥ ३६ ॥
टी०-कुगंध पदते पातक जानौं ॥ ३४ ॥ महादेवकी बाटिकासी बनी
चित्तमें लेप्यो मंदार [ कल्पवृक्ष-विशेष ] छहू काल [ छह ऋतु ] ॥ ३५ ॥
कहूं हंससों कहे हंस सहित हंसिनी मुक्तानके भोरे कहे भ्रमसों ओसके बुंद
चुनती हैं सो सबके चित्तको चोरावती हैं यासों हंसनकी मदमत्तता जनायो