रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशप्रकाशः १९. ( १९९ )
मारि हैं ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ तृण कहे तर्कस अक्षय कहे जाते बाण ना चुकें ॥
॥ ३७ ॥ लघुता शीघ्रता हनूमान ध्वज अग्रमें यासों चढे कि यह रथ कछू
राक्षसन माया मा कियो होइ बढे [ फूले ] अर्थ आनंदित भये ॥ ३८ ॥
मू०-रामकोरथमध्यदेखतक्रोधरावणकेबढ्यो । बीसबाहु-
नकीशरावलिव्योमभूतलसोंमढ्यो ॥ शैलहैसिकतागेयेसब
दृष्टिकेबलसंहरे । ऋक्षबानरभेदितत्क्षणलक्षधाक्षतनाकरे ॥
॥ ३९ ॥ सुंदरीछंद ॥ बाणनसाथविधेससबबानर । जायपरेम-
लयाचलकोधर ॥ सूरजमंडलमेंएकरोवत । एकअकाशनदी
मुखधोवत ॥ ४० ॥ एकगयेयमलोकसहेदुख । एककहैंभव
भूतनसोंरुख ॥ एकतिसागरमांझमरेमरि । एकगयेबड़वान-
लमेंजरि ॥ ४१ ॥ मोटनकछंद ॥ श्रीलक्ष्मणकोपकरयोज-
बहीं । छोड्योशरपावककोतबहीं ॥ जारयोशरपंजरछारक-
रचो । नैऋत्यनकोअतिचित्तडरयो ॥ ४२ ॥ दौरैहनुमंतबली
बलसों । लैअंगदसंगसबैदलसों ॥ मानौंगिरिराजतजेडरको
घेरेचहुंओरपुरंदरको ॥ ४३ ॥
टी०-सिकता [ बारू ] दृष्टिके बल कहे पराक्रम अर्थ अति बाणांधकारमों
काहूको कछू देखि नहीं परत क्षतना कहे मधुमक्षिकादिकनके छाता जामें मधु
रहत है ॥ ३९ ॥ ४० ॥ ४१ ॥ नैऋत्य [ राक्षस ] ॥ ४२ ॥ पुरंदर इन्द्र
सम रावण है गिरिराजनके सदृश अंगदादि हैं ॥ ४३ ॥
मू०-हरिच्छंद ॥ अंगदरणअंगनसबअंगनमुरझाइकै । ऋ-
क्षपतिहिअक्षरिपुहिलक्षगतिबुझाइकै ॥ बानरगणबाणनसन
केशवजबहींमुरच्यो । रावणदुखदावनजगपावनसमुहेजुरच्यो ॥
॥ ४४ ॥ ब्रह्मरूपकछंद ॥ इंद्रजीतजीतआनिरोंकियोसुबाण-
तानि । छोंडिदीनवीरबानिकानकेप्रमानआनि ॥ शिवप्रताप
काढिचापचर्मबर्ममर्मछेदि । जातभोरसात लैअशेषकंठमाल