राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)
History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha
महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभूगोल सम्बन्धी वर्णन ५
पालतू-पशुओं में गाय, बैल, भैंस, भेड़, बकरी, घोड़ा और ऊंट
मुख्य हैं। जंगली जानवरों में बाघ, चीता, रीछ, जरख (लकड़बग्घा), हिरन,
पशु-पक्षी नीलगाय, सांभर, चीतल, सूअर, भेड़िया, शियागोस
आदि पाये जाते हैं । पक्षियों में गिद्ध, चील, तोता,
कबूतर, फ़ाख़्ता, तीतर, बटेर, लवा आदि कई प्रकार के पक्षी हैं । जल
के निकट रहनेवाले पक्षियों में सारस, बतख़, बगुले, टिटहरी आदि हैं ।
जल-जंतुओं में मगर, मछलियां, मेंढक, केकड़े, कछुए, जलमानुस आदि हैं
खनिज पदार्थों की इस राज्य में खोज नहीं हुई है। प्रसिद्ध है कि
राजधानी प्रतापगढ़ के समीप की पहाड़ियों में लोहा है । धमोतर के
खानें पश्चिम में नकोर के पास इमारती पत्थर की खान
है। देवलिया के महलों का निर्माण उसी पत्थर से
हुआ है, परंतु कई वर्षों से यह खान बंद है । चूने का पत्थर राजधानी
प्रतापगढ़ से पांच मील दूर रजोरा और तेरह मील दूर कामलियाखाल
में मिलता है।
प्रतापगढ़ राज्य में अब तक कोई रेल्वे लाइन नहीं खुली है । राज्य
का निकटवर्ती रेल्वे स्टेशन पूर्व में बी० बी० एंड सी० आई० रेल्वे का
रेल्वे मंदसोर है, जो वर्तमान राजधानी प्रतापगढ़ से २०
मील दूर है ।
प्रतापगढ़ से मंदसोर स्टेशन तक पक्की सड़क है, जिसपर बैल-
गाड़ियां, तांगे और मोटरें चलती हैं। इस राज्य में इस सड़क की लंबाई
सड़कें १३ मील है और शेष ग्वालियर राज्य में है। आज-
कल प्रतापगढ़ से मंदसोर तक मोटर सर्विस जारी
हो जाने से लोगों को बड़ा सुभीता हो गया है। देवलिया, नीमच, धरियावद,
बांसवाड़ा, पीपलोदा और जावरा की तरफ़ गमनागमन के लिए कच्ची
सड़कें बनी हुई हैं और उधर मोटरें, तांगे आदि भी चलते हैं। राज्य के
अन्य भागों में गाड़ियों तथा ऊंट, घोड़ा आदि भार-वाहक पशुओं के जाने
लायक़ मार्ग हैं। बरसात में कच्ची सड़कें तथा पहाड़ी मार्ग खराब हो जाते