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राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

राजपूताने का इतिहास (मेवाड़ राज्य का इतिहास व वीर गाथाएँ)

History of Rajputana & Mewar by Gaurishankar Ojha

महामहोपाध्याय पं. गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished534 पृष्ठ

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४ प्रतापगढ़ राज्य का इतिहास
खरीफ़ की फ़सल की मुख्य पैदावार ज्वार, मक्का, तिल, कोदरा,
कुरी, सामली, माल, चांवल, मूंग, उड़द, चौंला, तूअर, सन, कपास आदि
हैं। रबी की पैदावार में गेहूं, जौ, चना, अफ़ीम, सरसों, अलसी, अजवाइन,
राई, बटला ( मटर ), मसूर और सुवा हैं। जहां जल की सुविधा है, वहां
गन्ने की खेती भी होती है। पहिले अफ़ीम की खेती बहुतायत से होती थी,
परंतु कितने एक वर्षों से अंग्रेज़-सरकार की ओर से उसका बोना कम
करा दिया गया है। शाकों में गोभी, आलू, कद्दू (कुम्हड़ा, कोला), प्याज़,
लहसुन, मूली, रतालू, अरबी, अदरक, बैंगन, भिंडी, तुरई, आल (लौकी),
गवार, मेथी आदि और फलों में आम, सीताफल (शरीफ़ा), केला, अनार,
अमरूद, शहतूत, अंजीर, पपीता और नींवू मुख्य हैं। जंगल की पैदावार में
सफ़ेद मूसली, गोंद, शहद, चिरौंजी तथा कत्था आदि हैं।
इस राज्य के उत्तरी तथा पश्चिमी पहाड़ी प्रदेशों में जंगल बहुत हैं।
पहले इन जंगलों की तरफ़ राज्य की ओर से कोई ध्यान नहीं दिया जाता
जंगल था, किंतु अब वे राज्य के प्रबंध में हैं। जंगल में
सागवान, शीशम, आबनूस, हल्दू, सालर, ढाक, धौ,
कदंब, महुआ, पीपल, बबूल, नीम, इमली, बांस आदि के वृक्ष हैं। सीता-
माता के पास केवड़ा अधिकता से होता है, जो सुगंधि के लिए प्रसिद्ध है।
सरीपीपली, दोनों सालिमगढ़, बजरंगगढ़, कनोरा और अरणोद में भरनेवाले
साप्ताहिक हटवाड़ों में भील लोग लकड़ियां, बांस आदि बेचने के लिए
ले जाते हैं, जिससे राज्य को लगभग सात हज़ार रुपये वार्षिक
महसूल की आय होती है। इन हटवाड़ों में सरीपीपली और सालिमगढ़
के हाट प्रसिद्ध हैं, जिनमें नीमच, मंदसोर और कभी-कभी नसीराबाद के
व्यापारी भी लकड़ी खरीदने के लिए जाते हैं। चंदन के वृक्ष इस राज्य में
सर्वत्र पाये जाते हैं, परंतु दक्षिणी भाग के बड़वास कलां और हतुण्या में
अधिकता से होते हैं, जो राज्य की ही संपत्ति समझे जाते हैं। घास सर्वत्र
होती है, पर मगरा ज़िले में अधिक। घास के कुछ स्थल राज्य के लिए
सुरक्षित हैं।