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सर्वकोश
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि द्वारा

DevanagariHindipublished307 पृष्ठ

पृष्ठ 70, कुल 307 में से

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पृष्ठ 70

प्राण ५५

हैं। हमारे प्राण का कम्पन एक विशेष प्रकार का है। जिनके प्राण का कम्पन हमारी तरह का है, उन्ही को हम देख सकेगे। परन्तु यदि कोई ऐसा प्राणी हो, जिसका प्राण अपेक्षाकृत उच्च कम्पन-शील है, तो उसे हम न देख पाएंगे। प्रकाश की उज्ज्वलता अत्यन्त अधिक बढ़ जाने पर हम उसे नही देख पाते, किन्तु बहुत से प्राणियो की आँखे ऐसी शक्तियुक्त है कि वे उस तरह का प्रकाश देख सकती है। इसके विपरीत, यदि आलोक के परमाणुओ का कम्पन अत्यन्त मृदु या हल्का हो, तो भी उसे हम नही देख पाते, परन्तु उल्लू और बिल्ली आदि प्राणी उसे देख लेते है। हमारी दृष्टि इस प्राण-कम्पन के एक विशेष प्रकार को ही देखने मे समर्थ है। इसी प्रकार वायुराशि की बात लो। वायु मानो स्तर-पर-स्तर रची हुई है। पृथ्वी का निकटवर्ती स्तर अपने से ऊँचे-वाले स्तर से अधिक घना है, और इस तरह हम जितने ऊँचे उठते जायेंगे, हमे यही दिखेगा कि वायु क्रमश तरल होती जा रही है। इसी प्रकार समुद्र की बात लो, समुद्र के जितने ही गहरे प्रदेश मे जाओगे, पानी का दबाव उतना ही बढेगा। जो प्राणी समुद्र के नीचे रहते हैं, वे कभी ऊपर नही आ सकते, क्योकि यदि वे आयें, तो उसी समय उनका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो जाय।

सम्पूर्ण जगत् को 'ईथर' (आकाश-तत्त्व) के एक समुद्र के रूप में सोचो। प्राण की शक्ति से वह मानो स्पन्दित हो रहा है और विभिन्न मात्रा मे स्पन्दनशील स्तरो मे बँटा हुआ है। तो देखोगे, जिस स्थान से स्पन्दन शुरू हुआ है, उससे तुम जितनी दूर जाओगे, उतना ही वह स्पन्दन मृदु रूप से अनुभूत होगा, केन्द्र के पास स्पन्दन बहुत द्रुत होता है। और भी सोचो, भिन्न-भिन्न प्रकार के स्पन्दन एक-एक स्तर हैं। इस सम्पूर्ण