राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 941, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ें१३२ राजतरंगिणी
कल्कि पुराण में भी खसों का उल्लेख मिलता है :
खश काम्बोजकाञ्च सर्वान् शबरान् यवनानपि ॥ ३२ ॥
मरुः खशैश्च काम्बोजैः युयुधे भीमाविक्रमः ।
देवापिः समरे धीनैर्यवनैः संतणैरपि ॥ ४१ ॥
कल्कि पुराणः तृतीयोध्याः ६: ३२ तथा ४१
प्लीनी ( सन् ७६ ई० ) का मत है । सिन्धु तथा जमुना की मध्यवर्ती पर्वतीय जातियां राग अर्थात्
केसी है । वे क्षत्री फेट्रीवोनी कही जाती थी । अरण्यवासी थे । अटकिन्सन का मत है—प्लीनी के अनुसार
उस समय खस कमायूँ तथा नेपाले के घुर पश्चिम में निवास करते थे । तालमो ( ८७-१६५ ई० ) का
उद्धरण देते हुए वह पुनः लिखता है—दरद जाति सिन्धु उद्गम के समीप कस्पेरोई झेलम, रावी, चनाब के
समीप रहते थे । उनके देश को कुलिन्द कहते थे । इस समय दरद अस्तोर तथा गिलगिट में रहते है ।
कस्पेरोई कश्मीर उपत्यका तथा सतलज के मध्य निवासी थे । कुलिन्द सतलज तथा गंगा के बीच में रहते थे ।
गिलगित से लेकर जोजिला पास का कश्मीरी भूखण्ड जिसका अधिक भाग अनधिकृत रूप से
के इस समय पाकिस्तान आधीन है, दरद जाति आज भी रहती है । उसे दरदिस्तान कहते हैं ।
नेपाल से कश्मीर तथा पामीर तक खस जाति बिखरी थी । एक समय था जब तिब्बतवासी कश्मी-
रियों को खद्दे कहते थे । इस समय तिब्बती खद्दे लोगो को मुसलमान कहते थे । कश्मीर के लोग मुसलमान
हो गये तो खद्दे शब्द मुसलमानों के लिये तिब्बतियों द्वारा प्रयुक्त होने लगा । तिब्बत सीमा मुस्लिम देश
कश्मीर है । चित्राल कश्कर, पत्तन मस्तूज के इलाकों के निवासी खो कहे जाते हैं । खशों में मुसलमान
तथा बौद्ध हो गये और शेष हिन्दू धर्म के रीति रिवाजों को मानते हुए पूर्ववत् क्षत्री रह गये ।