राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट 'न' १२९
गन्धर्वान् किन्नरान् यक्षान् रक्षोविद्याधरोरगान् ।
कलापग्रामकांश्चैव तथा किंपुरुषान् खसान् ॥ नी० ५७:५६
खसों की उत्पत्ति के विषय में महाभारत में कथा मिलती है। नन्दिनी गऊ ने अपनी रक्षा निमित्त
उन्हें अपने अंग से उत्पन्न किया था ।
मूत्रतश्चासृजत् कांश्चिच्छवरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥
आदिपर्व : १७४ : ३७
× × ×
असृजत् पल्लवान् पुच्छात् प्रस्त्रवाद् द्रविडान् शकान् ।
योनिदेशाच्च यवनान् शकृतः शबरान् बहून् ॥ ३५ ॥
मूत्रतश्चासृजन् कांश्चित् शवरांश्चैव पार्श्वतः ।
पौण्ड्रान् किरातान् यवनान् सिंहलान् बर्बरान् खसान् ॥ ३६ ॥
चिबुकांश्च पुलिंदांश्च चीनान् हूनान् सकेरलान् ।
ससर्ज फेनतः सा गौः म्लेच्छान् बहुविधानपि ॥ ३७ ॥
महाभारत आदिपर्व १७६ : ३६-३७
इस रूपक का यह अर्थ भी लगाया जा सकता है। खस गोरक्षक थे । क्षत्रियों का कार्य गो ब्राह्मण
की रक्षा करना था । उन्हें युद्ध किंवा रक्षा हेतु नन्दिनी गाय ने उत्पन्न किया था। वे क्षत्री थे। उनके क्षत्री
तथा क्षात्रधर्म व्रती होने में सन्देह नही रह जाता ।
वितस्ता उपत्यका के अधोभाग में बारहमूला के आगे खश रहते थे। वीरांका खशों का केन्द्र कहा
गया है। राजतरंगिणी (रा० तं० ८:४०९) के वर्णन से मालूम होता है। यह स्थान प्राचीन द्वारावती
के समीप था । द्वारावती को इस समय द्वारविडी कहते हैं। यह संस्कृत द्वारविद्या का अपभ्रंश है। वितस्ता
उपत्यका का यह भाग कयाई तथा मुजफ्फराबाद के मध्य है। एक मत है। खश पीर पंतसाल के दक्षिण
पश्चिम के निवासी है।
महाभारत सभा पर्व में भी खश जाति का उल्लेख आता है। उन्हें शकों तथा दरद जातियों तुल्य
अर्ध सभ्य जाति में परिगणित किया गया है। (सभापर्व ५२ : २-४) सभा पर्व में पुनः एक स्थान पर
उल्लेख आता है कि ये मरु तथा मन्दर पर्वत के मध्य शैलोदा नदी की उपत्यका में रहते थे ।
मेरुमन्दरयोर्मध्ये शैलोदामभितो नदीम् ।
ये ते कीचकवेणूनां छायां रम्यामुपासते ॥ १ ॥
खसा एकासना ह्यर्हाः प्रदरा दीर्घवेणवः ।
पारदाश्च कुलिन्दाश्च तङ्गणाः परतङ्गणाः ॥ ३ ॥
तद् वै पिपीलिकं नाम उद्धृतं यत् पिपीलिकैः ।
जातरूपं द्रोणमेयमहार्षुः पुञ्जशो नृपाः ॥ ४ ॥
महाभारत वन पर्व ५२:२-४