सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 918, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 918

सकते थे। उनका योनि सम्बन्ध भी दूषित था। वे विपरीत मिथुन करने के कारण भी पिशाच माने गये थे
जिसका निषेध शास्त्र करता था। यही कारण है कि पिशाच काशी में प्रवेश अपने आचरण के कारण नहीं
कर सका।
अग्नि पुराण (५१ : १८ ) पिशाचों की प्रतिमा-लक्षण का वर्णन करता है। हरिवंश पुराण के
भविष्य पर्व अध्याय ७९ तथा ८० में पिशाचो के आचार व्यवहार, भाषा तथा जाति का वर्णन है। हरिवंश
पुराण में वर्णन मिलता है—
पिशाच विकृतानन थे। उनके रोम पिंगल वर्ण थे। जिह्वा दीर्घ थी। महा हनु थे। लम्बा केश थे।
विरूपाक्ष थे। ही-ही-ही कहकर बात करते थे। मांस पिटक खाते थे। बहुत रुधिर पीते थे। विशालकाय
'थे। कृशोदर थे। शूलों में मुण्ड धारण किये हुए थे। अपने भुजाओं से यत्र-तत्र शव खींच लाते थे। वे प्राकृत
बोलते थे। दांत कटकटाते थे। कुत्तों का झुण्ड उनके साथ रहता था। प्राणियों की हत्या पर तुले रहते थे।
( हरिवंश पुराण भविष्य पर्व ७८ : १-६ तथा १७-१९ )
'भगवान् श्रीकृष्ण हिमालय स्थित बद्री नारायण के पुण्य क्षेत्र मे थे। उनके सम्मुख मासभक्षी दीपि-
काधारी, महाघोर पिशाच आया। भगवान् ने उसका परिचय पूछा। घण्टाकर्ण ने अपना परिचय देते हुए
कहा—'मै घण्टाकर्ण नामक पिशाच हूँ। मैं हिंसक हूँ। मैं मासभक्षी हूँ। मैं विकृतान हूँ। रुद्र के सखा कुबेर
का अनुचर हूँ। मेरे साथ मेरा अनुज है। पिशाचो की सेना मेरी है। कुत्तों का समूह मेरा है। भूतसेवित
कैलास है। मै यहाँ आया हूँ। मेरे कर्णों में घण्टा है। उससे ध्वनि होती रहती है। इसी कारण मेरा नाम
घण्टाकर्ण पड़ गया है। मै शंकर की आराधना करता हूँ।'
( हरिवंश : भविष्य खण्ड ८० : १, २४-२७ )
'कृष्ण के प्रश्नों का उत्तर देकर घोर रूप विकृतानन पिशाच ने बहुत रुधिर पीकर इच्छानुसार
मांसादि भोजन किया। अपने पार्श्व में अत्तडियों का विशाल मांम रख लिया। कृष्ण आसन पर जल छिड़-
कर शुद्ध किया। समीपवर्ती कुत्तापालक वह पिशाच वहा से कुत्तों को दूर हटाकर समाधि लगाने का
प्रयास करने लगा।
(हरिवंश पुराण : भविष्य खण्ड ८० : ५४-५७ )
सर्व श्री अल्डेन वर्ग, मेकडोनेल, कीथ, लकोटे, तथा स्टेन कोनो पिशाच शब्द का अर्थ असुर, दैत्य
तथा राक्षस लगाते है। मेकडोनेल तथा कीथ का मत है कि कालान्तर में पिशाच शब्द विरोधी जाति के लिये
प्रयुक्त किया जाने लगा था। श्री ए० हिले ब्राट का मत है कि वह शत्रु जाति थी जो आगे चलकर परम्परा-
गत भूत हो गयी थी। पारजिटर का मत है कि उनकी असुर तथा पैशाची किंवा राक्षसी प्रकृति उनके
वास्तविक रूप का विपर्यय है। श्री ग्रियर्सन का मत है कि वे एक जाति थे जो उत्तर पश्चिम में निवास
करते थे।