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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 916, कुल 984 में से

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पृष्ठ 916

परिशिष्ट ढ १०७
वायु पुराण (१०१-२८) में सर्प, भूत, पिशाच, नाग एवं मनुष्यों को पृथ्वी लोक का निवासी
बताया गया है।
राजमार्ग, वीथियों, गृह समीपस्थ उपवन, चौराहा, चबूतरा, द्वारदेश, निर्भय अट्टालक, एकान्त
आवास, पथ, नदी, तीर्थ, देवी तथा देवताओं के कल्पित निवास, वृक्ष, महापथ अर्थात् स्मशान मार्ग आदि
पिशाचो के निवास स्थान हैं। अधार्मिक, वर्णाश्रम, मर्यादा का अतिक्रमण करने वाले, वर्णसंकर, शिल्पी
हैं। देवताओं ने इनके कर्मों की आजीविका पिशाचों के हेतु बनाया है। चोरी, विश्वासघात, कुत्सित साधनों
द्वारा धनोपार्जनादि कर्म पिशाचों के कहे गये हैं। मधु, मास, दही, तिल, चूर्ण, मदिरा, आसव, धूप,
हरिद्रा, खिचड़ी, तेल, मोघा, गुड़, भात, काला वस्त्र, धूम तथा पुष्पों द्वारा पर्वों की संधियों के अवसर पर
पिशाचों को बलि देना चाहिए अर्थात् उक्त खाद्य पदार्थ पिशाचों के प्रिय हैं।
पिशाचों का प्रलय काल मे किस प्रकार नाश होगा इसका वर्णन वायु पुराण (११:१५९) में
किया गया है। प्रलय काल में महान् संवर्तक की ज्वालाएं सहस्रों, अरबों योजन ऊपर उठती है। गन्धर्वो,
पिशाचों एवं राक्षसो के आश्रमों को सर्वशंतः भस्म करने के उपरान्त गोलोक को भी यह भस्म कर देती हैं।
ब्रह्माण्ड पुराण के अनुसार पिशाच राक्षसो से तीन स्थान निम्न थे अर्थात् राक्षस पिशाचो से तीन
स्थान ऊँचे थे। राक्षसों में उतनी आचरण तथा आचारहीनता नही थी जितनी पिशाचों मे थी। (३:
७:३७६-४११; २:३२:१-२; ३५:१९१)
पिशाच श्राद्ध तथा पितृ पूजन विरोधी थे। ब्रह्माण्ड पुराण (३:११:८१) में वर्णन मिलता
हैं कि ये श्राद्धों को नष्ट करते थे। इसी पुराण (३:७:२:५६) में वर्णन है कि रावण ने पिशाचों
को पराजित किया था।
पिशाचों के स्वामी शिव कहे गये हैं। ब्रह्माण्ड पुराण (२:३२:१-२, ३५, १९१) में इसका
उल्लेख मिलता है। मत्स्य पुराण (८:५) कहता है कि जगत् पितामह ब्रह्मा ने जिस समय सृष्टि की
रचना समाप्त की तो पृथ्वी मण्डल राजा पृथु को दिया। उन्होंने किसी न किसी को सबका अधिनायक
किंवा स्वामी बनाया। पिशाच, राक्षस, भूत, प्रेत, वैताल तथा यक्षों का अधिनायक किंवा स्वामी शूलपाणि
को बनाया।
भागवत पुराण (१:१५:४३) में चीर वस्त्र धारण, मौन, केश खोलकर बिखेर लेने की
उपमा जड, उन्मत्त पिशाच से दी गयी है। भागवत में विराट रूप का वर्णन ( : ६ : ४३ ) करते हुए
प्रेत, पिशाच, भूत, कूष्माण्ड का उल्लेख एक साथ कर उन्हें एक वर्ग में रखा गया है। कूष्माण्ड पिशाचो से
अलग नही किन्तु वायु पुराण की तरह पिशाचों की एक शाखा है। (६:८:२५)। यातुधान, प्रमथ,
प्रेत, मातृका, पिशाच तथा ब्रह्मराक्षस को एक ही वर्ग में रखा गया है तथा उन्हें भयावना कहा गया है।
(१०:६:२७) डाकिनी, राक्षसी, कूष्माण्ड को बालग्रह कहा गया हैं। वायु पुराण में पिशाचो का
वर्णन करते हुए कहा गया है कि ये शिशुओ के शत्रु होते है। उसी के लिये भागवत ने 'बालग्रह' शब्द
का व्यवहार किया है। यहाँ भी भूत, प्रेत, पिशाच, यक्ष, राक्षस, विनायक एक ही वर्ग में रखे गये
है। भागवत पुराण (१०:८५:४१) में दैत्यराज बलि ने कृष्ण को कहा है—'हम और हमारे
समान अन्य दैत्य, दानव, गन्धर्व, सिद्ध, विद्याधर, चारण, यक्ष, राक्षस, पिशाच, भूत, प्रमथनायक आदि
आपसे प्रेम करना दूर रहा सर्व दृढ़ वैर भाव रखते हैं।' यहाँ पर बलि ने स्पष्ट कहा है कि पिशाच
कृष्ण किंवा विष्णु भक्त नही थे।