राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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में अर्जंजन के दक्षिण-पूर्व बहती है । इस में एक नदी का नाम मोलांग्य है । मोलांग्यो स्त्री भाषा में दूध
को कहते हैं । पूर्व मुस्लिम काल में यहां के राजाओं की उपाधि शोरयान शाह थी ।
सोलहवी शताब्दी के पूर्व वक्षु अर्थात् आमू दरया कैस्पियन सागर में मिलती थी । प्राकृतिक कारणों
से धारा बदल गयी । इस समय यह अरल सागर में गिरती है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर पूर्व
काल में मिले थे । इस समय दोनो सागरो के बीच विस्तृत भूखण्ड है । कैस्पियन सागर का वर्तमान रूप
पूर्व रूप से भिन्न है । कैस्पियन सागर शताब्दियो पहले पूर्व दिशा में बहुत दूर तक फैला था । आज यहां
सूखा भूभाग है । उत्तर में इसी प्रकार बहुत दूर तक चला गया था । अरल सागर कैस्पियन सागर का
एक भाग है । कैस्पियन सागर तथा अरल सागर के मध्य का भूखण्ड कैस्पियन सागर में जलमग्न था ।
अतएव आमू ( वक्षु ) तथा सीर दरया दोनो कैस्पियन सागर में मिलती थी ।
अरसीद तथा सहसनीट काल में आर्यों तथा पारसियों का गाथाकालीन मूलस्थान आमू तथा सीर
दरया के अन्तर्वेदी ( दोआब ) में था । उसे स्वर्णयुग का देश कहते थे । कालान्तर में जेंगा वेन्दोदद से
प्रतीत होता है यम शीत तथा प्राकृतिक उपद्रवो से बचने और आबादी अधिक होने के कारण दक्षिण
दिशा की ओर जनता को ले गया । यह स्थान आर्यों के पूर्व उस समय था । आर्यों का ज्ञातव्य जगत् महा
जाता था ।
आर्यों के देश त्याग देने पर अनार्य जातिया वहा बस गयी । तूर्य शब्द अनार्य जातियों के लिए
अभिहित किया गया है । अतएव पारसी ग्रन्थो में शको का उल्लेख होना अनिवार्य प्रतीत होता है । उसका
कारण है । शको द्वारा आबाद भूभाग के साथ पारसी जाति के धर्म तथा इतिहास का निकट सम्बन्ध हो
जाता है । पारसियों के ग्रन्थो में आर्य, तूर्य, शरिम, सैन तथा दाह जाति का उल्लेख मिलता है । पश्चिमीय
विद्वानों का मत है तूर्य तथा सरीमा शब्द शको के लिए आया है । ईरानी गाथा पुस्तकों में सरोया, तूर्य
तथा आर्य ध्रोतोना के तीन पुत्र कहे गये है । कालान्तर में ध्रीतोना का रूप अचमीनिअन काल में यह क्षेत्र
शक तथा शकतिग्रखोदा जातियो द्वारा आबाद था । कुछ समय पश्चात् शको ने इस क्षेत्र को त्याग दिया ।
सीस्तान में चरभूमि तथा कालक्षेप की सुविधाओ के कारण आकर बस गये । एक मत है कि पामीर के
गलचा तथा शाल्ती जाति पूर्वकालीन शक वंशज हैं । यह दोनो जातिया इस समय पाकिस्तान द्वारा अधि-
कृत कश्मीर में है । उनका नाम फरीदून शब्द में बदल गया है । उस समय आर्य, तूर्य, तुर्क तथा सरिय
एक ही थे । फिरदौसी की गाथा में फरोदून के पुत्रो का नाम सम, जल, तथा रुदवाह मिलता है ।
कालान्तर में तूर्य सज्ञा शक जाति के लिए दी जाने लगी । तोखनि, कुशान, खिषोनाइट, सकरोसाह,
तथा तुर्क जाति की मूल जाति तूर्य हैं ।
ऋग्वेद में तुर्वसु का उल्लेख है । भागवत पुराण के अनुसार जनमेजय के पुरोहित तुर्कावशेय तुर्वसु
जाति के वंशज थे । म्लेच्छ तथा यवन तुर्वसु की सन्तान माने जाते हैं । ( वायु पुराण ९९ : ३; भागवत
१० : २२, २५, २७ )
स्वर शब्द का अर्थ शीघ्रगामी अथवा जल्दी होता है । तुर्ग शब्द अश्व का भी वाचक है । तूर्य
अथवा शक लोग अश्वारोही थे । शीघ्रगामो थे । तूर्य शब्द वैदिक शब्द तुर्ववसु अथवा स्वर का अपभ्रंश
हो सकता है ।
फिरदौसी तूरान क्षेत्र को तूर, तुर्क तथा चीनियो का निवास स्थान मानता है । आमू दरया को