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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 859, कुल 984 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 859

परिशिष्ट 'छ'
कुरु
( तरंग १:५१: पृष्ठ ९५ )
ऋग्वेद में कुरुओं का उल्लेख एक जाति के रूप में नहीं किया गया है। कुरुश्रवण नामक एक राजा
( १० ३३ ४ ) और राजा पाकस्थामन् कौरयाण का उल्लेख ( ८:३:२१ ) में किया गया है। अथर्ववेद
( २०:१२७ ) एव अग्रिम खिल ( ५ १० ) में कुरुओं के राजा परीक्षित का उल्लेख किया गया है। जिनके
पुत्र जनमेजय शतपथ ब्राह्मण ( १३:५ ४, १३ ५.१.४ ) में अश्वमेध सम्पन्न करने वाले एक महान् राजा
के रूप में वर्णित है। कुरुश्रवण जो कि नाम से कुरुओं से संवद्ध प्रतीत होता है त्रासद्दस्यव अर्थात् त्रसदस्यु
का वंशज माना गया है। पुरूओ मे प्रसिद्धराजा । था ब्राह्मण साहित्य में कुरु जाति को महत्त्वपूर्ण स्थान दिया
गया है। कुरु पांचाल का नाम प्राय. एक साथ मिलता है ( जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:७:६, ८:७, ४.७:२;
वोपनिषीय उपनिषद् ४ १, काठक संहिता १०-६; वाजसनेयी संहिता ११:३:३) । शतपथ ब्राह्मण ( १:७:-
२८ ) में कुरुपंचाली यज्ञ प्रणाली सर्वश्रेष्ट कही गयी है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार ( ३:२:३१५ ) कुरु-
पांचाल वाणी का निवास स्थान था। तैत्तिरीय ब्राह्मण ( १:८:४:१-२ ) से प्रकट होता है कि उनके राजा
हिम काल में आक्रमण करते थे। ग्रीष्म काल आते ही लौट जाते थे। उपनिषदो में कुरुपांचाल के ब्राह्मणों
की अत्यन्त प्रशंसा की गयी है । ( जैमिनीय ब्राह्मण २:७८; जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण ३:३०:६,
४ १:२ ) । ब्राह्मण एवं उपनिषद् काल में कुरु-पाचाल प्रसिद्ध थे। इसी क्षेत्र में भारतीय पुरा कालीन ग्रन्थों की
रचनायें विशेष रूप से हुई थी । कुरुजनपद के विशद इतिहास का वर्णन पुराणों एवं महाभारत में मिलता
है। उनका प्रारम्भिक इतिहास कौरवो के इतिहास का अंग है। कालान्तर में वे कौरवों के नाम से
प्रसिद्ध हुए ।
रामायण में अयोध्या काण्ड ( ९१:१९ ) में कुरु का सर्वप्रथम उल्लेख आया है। भरद्वाज ने भरत के
सत्कार निमित्त जिन वस्तुओं का आयोजन किया था, उसमें उत्तर कुरु के विषय में कहते हैं—उत्तर कुरु
वर्ष में दिव्य चैत्ररथ वन है। वहाँ दिव्य वस्त्र एवं आभूषण वृक्षो के पत्र-पुष्प हैं। दिव्य नारियाँ उन वृक्षों
में फल हैं। कुबेर का वह शाश्वत वन यहाँ आ जाए।'
रामचन्द्र सीता से चित्रकूट की प्राकृतिक शोभा की तुलना करते हुए कहते है—उत्तर कुरु की शोभा
भी चित्रकूट के आगे तुच्छ है। ( अयोध्या काण्ड ९४.२६: ) कबन्ध ने सीता के अन्वेषण निमित्त पश्चिम
दिशा के वर्णन के समय उत्तर कुरु के वनों की उपमा दी है। ( अरण्यकाण्ड ७३:७: )
रामायण किष्किन्धा काण्ड ( सर्ग ४३:११, ५९ ) में कुरु का दो बार उल्लेख आया है। यहाँ पर
श्लोक ११ में केवल कुरु शब्द तथा ५९ में उत्तर कुरु का उल्लेख है। स्पष्ट है रामायणकाल में दो कुरु प्रदेश
थे। कुरु, जिसे कालान्तर में कुरुक्षेत्र कहा गया, तथा उत्तर कुरु हिमालय के पास था। उत्तर दिशा में सोम-
गिरि के समीप था। गन्धर्व, किन्नर, सिद्ध, नाग, विद्याधर, आदि देशों के पश्चात् उत्तर कुरु से आगे जाने का