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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 856, कुल 984 में से

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पृष्ठ 856

परिशिष्ट च ५१
वर का जल निरन्तर ताजा तथा स्वच्छ बना रहता है। शुद्धता बनी रहती है। यदि सरोवर साफ कर
दिया जाय तो जल में और शुद्धता आ जायेगी। मैं समझता हूँ कि सरोवर का जीर्णोद्धार लगभग
छह सौ वर्षों से नहीं हुआ होगा। सम्भव है कभी किसी धर्मप्राण व्यक्ति ने सरोवर को साफ करा
दिया हो।
सबसे आश्चर्यजनक बात जल के न जमने तथा तुषार के न होने का वर्णन, कल्हण तथा नीलमत
पुराण ने नही किया है। मालूम होता है। यह बात उस समय लोगों में इतनी प्रचलित तथा साधारण थी
कि इसके वर्णन की आवश्यकता का अनुभव नही किया गया होगा।
यहाँ पर कोई विशाल भग्नावशेष अथवा कोई विशेष चामत्कारिक बात नही देखकर मेरे काश्मीरी
मित्रों ने मुझसे पूछा। इस स्थान का इतना महत्त्व क्यों दिया गया? यहाँ आते समय मैं थी स्तीन का
वर्णन ध्यानपूर्वक पढ़कर नही आया था। स्तीन द्वारा लिखित सब बातों का मुझे ज्ञान नही था। आधुनिक
जगत् के लोग सर्वत्र कुछ आकर्षक, कुछ भव्य, कुछ तुरन्त प्रभावकर, वस्तुओं से प्रभावित होते हैं। मैने
तुरन्त उत्तर दिया। यहाँ की सबसे बड़ी विशेषता यह है। यह पहाड़ी इस उपत्यका में तीनों तरफ के
भूमि तल से ७० फीट ऊँची है। दक्षिण-पश्चिम की तरफ ढालू जमीन होती कम से कम ५० फीट तक
नीची पहुँच गयी है। इसके तीन दिशाओं में सरिता का प्रबल प्रवाह है। सरिता का वेगशाली प्रवाह निर-
न्तर एक रूप बहता चला जा रहा है। फिर भी जल नदी के जल स्तर से ७० फीट ऊँचाई पर कैसे पहुँच-
कर निर्झर हो गया, यह वास्तव में प्रकृति की एक विचित्र लीला है। शिखर पर जहाँ सरोवर है, यह स्थान
उपत्यका में सबसे ऊँचा है। उससे ऊँचा और कोई स्थान वहाँ पर नहीं है। इसके दक्षिण तथा वाम पार्श्व
में ऊँचे पर्वत हैं। वाम पार्श्व का उत्तुंग पर्वत सरिता पार है, तो दूसरी ओर ढालू भूमि के छोर के पश्चात्
पुनः ऊँचा पर्वत खड़ा है। इस प्रकार जल का इस शिखर पर पहुँचना उसी प्रकार हो रहा है, जैसे किसी
नगर के पानी कल (वाटर वर्क्स) के लिए इंजन तथा पाइप द्वारा जल संग्रह हेतु ऊपर पहुँचाया
जाता है।
जहाँ भी शिखरों पर जल मिलता है, वहाँ या तो एकत्रित किया हुआ वर्षा जल रहता है,
अथवा किसी उत्तुङ्ग शिखर से जलप्रपात का जल आता संग्रहीत हो जाता है। यहाँ दोनों बातें नहीं
हैं। यह जल तो भेदगिर पर्वत के शिखर के मध्य स्थान में केवल ६० फीट वर्गाकार समतल भूमि में निकल
रहा है। जैसे किसी शिखर पर किसी नगर के जल पूर्ति निमित्त टैंक का निर्माण कर उसमें जल भरा
जा रहा था।
जल सरोवर द्वार देश के नीचे से अभी तक प्रवाहित होता है। वह कुछ ही गजों के पश्चात् उसी
पहाड़ी में लोप हो जाता है। पहाड़ी के नीचे जहाँ पुनः निर्झर निकलता है उसके जल में गन्धक की महक
होती है। इस जल में गन्धक की गन्ध नहीं है। अतएव माहात्म्य तथा प्राचीन पुस्तकों में वर्णित जल के लुप्त
होने की घटना यहाँ सच दिखायी पड़ती है।
इस तीर्थ को यात्रा चैत्र शुक्ल में करने का माहात्म्य है। स्थान दुर्गम होने के कारण, समस्त जनता
के मुसलमान हो जाने के कारण, यहां का महत्त्व कम हो गया है। यहाँ के महत्त्व में अधिक कमीका कारण
हालमोगलपुर में नवीन भेदा देवी की स्थापना है। वहाँ दर्शन करने का माहात्म्य मूल भेदादेवी के माहात्म्य