राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२ राजतरंगिणी
नाग जाति के सत्ताहीन होने पर लोगों ने उन उपासनाओं, पूजाओ, कथाओं को नाग जाति सम्बन्धी
पूर्व पुरुषों तथा देवताओ से न सम्बन्धित मानकर उन्हें अपने पूजित देवों के समान वृषभ तथा गो-पूजा, की
तरह पशु पूजा तथा अश्वत्थ कदम्ब की तरह वृक्ष पूजा का रूप दे दिया। पशु पूजा के प्रतीक पशुपति महा-
देव थे अतएव सर्पादि नाग पूजाओ का भी प्रतीक शंकर को बना दिया गया। उनके रूप की जो नवीन कल्पना
की गयी उसमे नाग उनका आभूषण बना दिया गया। मूल पूजा, उपासना तथा गाथा का विकृत रूप मात्र
रह गया। शंकर की मूर्ति में नाग आभूषण रूप बना था अतएव शंकर के साथ नाग की पूजा अनायास
होने लगी।
नीलमत पुराण नाग पूजा का विस्तृत उल्लेख करता है। नागराज तथा पिशाच राज निकुम्भ की
मित्रता कश्मीर मण्डल में हो गयी थी। इस गाथा से दोनो जातियों का एक साथ किसी रूप में कश्मीर में
मिलकर रहने की ओर संकेत मिलता है। कश्मीर के मूल निवासी नागाओं ने पिशाचों के साथ संघर्ष नहीं
कर उनसे सन्धि किंवा मित्रता कर ली।
नाग जाति पिशाच जाति की अपेक्षा आर्य जाति को अधिक प्राथमिकता देती थी। पिशाचो की अपेक्षा
आर्यों की तरफ अधिक नाग जाति आकर्षित थी। नाग जाति के साथ प्रारम्भ में रहने के कारण पिशाच
जाति ने नागो के पर्व, तीर्थ, पूजा तथा स्मारकों के उपलक्ष्य में होने वाले उत्सवों में सक्रिय भाग लेकर
उन्हें अपना लिया। इस प्रकार नाग तथा पिशाच जाति द्वारा एक संकर जाति कश्मीर में उत्पन्न हो गयी।
दोनो जातियाँ मिलकर कश्मीर मे रहने लगी।
कश्मीर मे आर्य आये। उनके पूर्व पिशाच तथा नाग तथा उनके मिश्रण से उत्पन्न वर्ण संकर जातियाँ
वहाँ रहती थी। आर्यों ने पिशाच तथा नाग जाति की परम्परा साथ-साथ रहने के कारण कालान्तर में अपना-
कर नाग-पूजा को किसो न किसी रूप में स्वीकार कर लिया। अतएव कश्मीर में नाग पूजा का लोप नही
हुआ। वह प्रचलित रही। नीलमत पुराण नाग-पूजा को मान्यता देता है। (नी० २२६, २२७)
विष्णु धर्मोत्तर पुराण मे नागजाति का द्रविड, कम्बोज, अम्बष्ट तथा शक के साथ वर्णन किया गया
है। (१:९.६)
नीलमत पुराण में नील नाग का उपदेश है। लगभग दोतिहाई नीलमत पुराण नील नाग के मुख द्वारा
उच्चरित किया गया है। उनके वंश के विषय में कहा गया है कि वे कश्यप पिता तथा कद्रू माता की सन्तान
थे। कद्रू दक्ष की कन्या थी। देव, दैत्य, दानव, खश, भद्र, गरुड़ आदि सभी कश्यप की सन्तान थे। उनकी
गरुड़ से शत्रुता थी। उनके राजा वासुकी के निवेदन पर भगवान् विष्णु ने सतीसर मे उनको रक्षा का
प्रबन्ध किया। उनका राजा नील नाग बना। जलोद्भव असुर का विनाश तथा सतीसर सूख कर भूमि होने
पर नील कश्मीर में मानवों को लाना चाहा परन्तु नागो ने विरोध किया। इससे क्रुद्ध होकर कश्यप ने शाप
दिया कि वे छ मास पिशाच तथा छ मास मनुष्यों के साथ निवास किया करेंगे। पर चार Seans शाप के
पश्चात् उन्हें सर्वदा के लिये मानवों के साथ कश्मीर मे रहने के लिये आदेश दिया।
नाग पट्टङ्गल मनुष्यों की दाराओ को हर ले जाता था। नागराज नील ने उसके इस अपराध के
कारण कश्मीर से निर्वासित कर दिया था। उसे दार्ब देश में उशीरंक पर्वत पर रहने का आदेश दिया। विष्णु
ने उसे नील की प्रार्थना से उस स्थान पर रहने के लिये सुरक्षा का विश्वास दिलाया (नीलमत १६५-६७; ६१)
राजा विश्वगश्व से महापद्म नाग ने चन्द्रपुर नगर चतुराई से दान मे प्राप्त किया था। (नील० १७३-४७)
नीलमत मे लगभग ६०३ नागाश्रो का उल्लेख मिलता है। नाग पूजा का भी वर्णन किया गया है।