राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५९८ राजतरंगिणी
लवणार्णवपानेन तर्पोत्कर्षमिवोद्वहन् ।
यत्प्रतापो रिपुस्त्रीणां सनेत्राम्भोऽभजन्मुखम् ॥४७८॥
४७८. जिसका प्रताप लवणसमुद्र जल का पान करने से मानों तृषाधिक्य को
धारण करता हुआ, शत्रु स्त्रियों के साश्रु मुख का सेचन करता था ।
आसन् येऽरिमनोऽगाधवोधदण्डा इवाहृतः ।
यस्याद्यापि जयस्तम्भाः सन्ति ते पूर्ववारिधौ ॥४७९॥
४७९. पूर्व सागर पर शत्रुमन के अगाध बोध के मापदण्ड स्वरूप लाये गये जो
उसके जयस्तम्भ १ थे, वे आज भी हैं ।
प्रभावाङ्केन वङ्गालान् जित्वा येन व्यधीयत ।
काश्मीरिकनिवासाय कालम्बाख्यो जनाश्रयः ॥४८०॥
४८०. जिसने प्रभाव से वंकालों को विजित कर काश्मीरियों के निवास हेतु कालम्ब १
नामक जनाश्रय २ बनवाया ।
श्री बाली यह समय सप्तर्षि संवत् ४२२४ तथा
सन् ५५४ ई. देते हैं । कलि गताब्द ३६९६ वर्ष ११
मास १३ दिन, ट्रायेर के मत से यह समय सन् ५५६
ई. ११ मास और कनिंघम के अनुसार सन ५७६ ई.
६ मास आता है ।
श्री विदेउद्दीन राजा बालादित्य को शाहू
यज्दे जिर्द का समकालीन बना देता है । उसमें
उसने उत्तरी पूर्वीय क्षेत्र जीतकर कश्मीर के राज्य
में मिला लिया था ।
४७९ ( १ ) जयस्तम्भ : जयस्तम्भो की
समानता सेसक के स्तम्भो तथा यूनानो तथा रोमनो
के जय स्मारक किंवा जय चिन्हो से की जा सकती
है । जयस्तम्भ भारत में अनेक स्थानो पर मिलते
हैं । कुतुब मानार अर्थात् विष्णु पर्वत पर विष्णु
मन्दिर का अष्टधातु का जयस्तम्भ इसका ज्वलन्त
उदाहरण है । उस पर चन्द्रगुप्त तथा समुद्रगुप्त
की कीर्ति तथा विजय का वर्णन उल्लिखित है ।
इसी प्रकार का स्तम्भ प्रयाग आदि स्थानो का है ।
यह जयस्तम्भ यूनानियो के काष्ठ अपस्तम्भ के
समान निर्मित भी किये गये होंगे । वे कालान्तर में
शत्रुओं की विषम मार से नष्ट हो गये हैं ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४८० में 'वङ्गालान्' का पाठभेद
'वंकालो' और 'वङ्गाला' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४८० ( १ ) वंकाल : वंकालों का स्थान तथा
वे किस प्रकार के लोग थे अभी तक कुछ प्रकाश
इतिहास नहीं डाल सका है । अनुमान बहुत लगाये
गये हैं । इस पर अनुसंधान की आवश्यकता है ।
पूर्वोय समुद्र जयस्तम्भ के पश्चात् ही वंकाल
का वर्णन मिलता है । यह 'वंग' किंवा 'बंगाल'
शब्द का मूल रूप किंवा अपभ्रंश प्रतीत होता है ।
कतिपय अनुवादकों ने इसका अर्थ 'बंगाल' ही
लगाया है । 'वंकाल' शब्द 'संस्कृत' अथवा कश्मीरी
नही प्रतीत होता । बंगाल की संज्ञा सर्वदा गौड़
तथा वग या बंगाल से दी गयी है ।
( २ ) कालम्ब : इस स्थान का अभी तक
पता नहीं चला है ।
( ३ ) जनाश्रय : इसका अर्थ सार्वजनिक
धर्मशाला अथवा सराय से है ।
सराय शब्द आश्रय का अपभ्रंश प्रतीत होता
है । दोनों का अर्थ एक ही है ।