राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५८३
मर्त्यसंस्पर्शभीरुः सा महादेवीभवन्त्यपि ।
तं मायया मोहयन्ती न पस्पर्श कदाचन ॥४३७॥
४३७. मनुष्य स्पर्श से भीरु वह राजपत्नी होती हुई भी, उसे माया मोहित कर,
उसका कभी स्पर्श नहीं किया ।
व्यधान्मायामयीं राज्ञस्तल्पे स्वसदृशीं स्त्रियम् ।
स्वयं सा भ्रमरीरूपा निर्जगाम वहिर्निशि ॥४३८॥
४३८. राजा के तल्प पर अपनी तरह मायामयी स्त्री बना देती थी और भ्रमर
रूपा वह स्वयं रात्रि में बाहर चला जाती थी ।
स नाम्ना स्वस्य देव्याश्च कृत्वा सुरगृहद्वयम् ।
माहेश्वरः शैललिङ्गे कारयामास कारुभिः ॥४३९॥
४३९. उसने अपने और देवी (रानी) के नाम से दो देव मन्दिर निर्मित करा,
शिल्पियों द्वारा शैल लिंग१ पर माहेश्वर२ (शिव) बनवाया ।
श्वः प्रतिष्ठाप्रसङ्गेऽथ सज्जे तल्लिङ्गयोर्द्वयम् ।
देशान्तरागतः कश्चित् दूषयामास दैववित् ॥४४०॥
४४०. दूसरे दिन प्रतिष्ठा अवसर पर देशान्तर से आये किसी दैवविद् से (ज्योतिषी)
ने उन दोनों लिंगों को दोष पूर्ण कहा—
स दृष्टप्रत्ययः शश्वत् तयोर्घटितलिङ्गयोः ।
अश्मखण्डैः समण्डूकैः बभाषे गर्भमावृतम् ॥४४१॥
४४१. शश्वत् दृष्ट प्रत्यय उसने कहा-'निर्मित उन दोनों लिंगों का गर्भ मण्डूक
सहित अश्म खण्डों से आवृत है।
[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - बायाँ स्तम्भ]
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४३९ में 'स' का 'स्व', 'सुर' का
'स्वर', 'पर' एवं 'माहेश्वरः' का पाठभेद 'माहेश्वरे'
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
४३९ (१) शैल लिंग : इसका अर्थ होता है
कि विशाल पाषाण खण्ड पर शिव लिंग का निर्माण
कराया ।
(२) माहेश्वर : वायुपुराण (अ० २३)
तथा लिंग पुराण (अ० २४) में एक कथा वर्णित
है । उसके अनुसार माहेश्वर ने ब्रह्म देव से कहा
था कि युगों के अठाईसवें प्रत्यावर्तन में कृष्ण
द्वैपायन के समय जब व्यासदेव जन्म लेंगे तब
[पादटिप्पणियाँ एवं पाठभेद - दायाँ स्तम्भ]
वे श्मशान में पड़े हुए एक मृत शरीर में प्रविष्ट
होकर 'सकुलिन्' नामक ब्रह्मचारी के रूप में
अवतार लेंगे। यह घटना कायावतार किंवा काया-
रोहण में घटित होगी । उनके चार शिष्य (१)
कुशिक (२) गर्ग (३) मित्र और (४) कौरुष्य होंगे ।
अन्त में पाशुपत शरीर में भस्म लगाकर माहेश्वर
योग करते रुद्र लोक में जायेंगे । माहेश्वर नाम अति
प्राचीन है । विम कदफिसस और वलभी वंश के राजा
स्वयं को महेश्वर कहते थे । ह्वेनत्सांग ने माहेश्वर
मन्दिरो का उल्लेख किया है। उनमें पाशुपत पूजा
करते थे । मध्य भारत में माहेश्वर तीर्थ है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ४४१ में 'शश्वत्' का ...