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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 757, कुल 984 में से

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पृष्ठ 757

५७४ राजतरंगिणी
तस्यान्यपोह्यमाहात्म्य देवी दिव्याकृतेः प्रिया ।
विष्णुशक्तिः क्षितिं प्राप्ता रणारम्भाभिधाऽभवत् ॥ ३९१ ॥
३९१. उस दिव्याकृति की प्रिया अनश्वर माहात्म्य वाली देवी रणारम्भा नाम्नी हुई
थी, जो पृथ्वी पर उत्पन्न विष्णु शक्ति¹ थी ।
स हि जन्मान्तरे पूर्वं द्यूतकारोऽभवत्किल ।
कदाऽपि प्राप निर्वेदं सर्वस्वं कितवैर्जितः ॥ ३९२ ॥
३९२. वह पहले जन्मान्तर में द्यूतकार ( जुआड़ी ) था । किसी समय कितव ( धूर्त
जुआड़ी ) के सर्वस्व विजित करने पर वह निर्वेद ( विरक्ति ) प्राप्त किया ।
देहत्यागोद्यतोऽप्यासीत् प्राप्य किंचिद्विचिन्तयन् ।
न पर्यन्तेऽप्युपेक्षन्ते कितवाः स्वार्थसाधनम् ॥ ३९३ ॥
३९३. देह त्याग हेतु उद्यत भी प्राप्य ( लाभ ) का चिन्तन कर रहा था। कितव
जन¹ अन्त काल में भी स्वार्थ साधन की उपेक्षा नहीं करते ।
अवन्ध्यदर्शनां विन्ध्ये देवीं भ्रमरवासिनीम् ।
द्रष्टुमैच्छद्वराकाङ्क्षी निर्व्यपेक्षः स्वजीविते ॥ ३९४ ॥
३९४. उसने प्राण से निरपेक्ष होकर वर की आकांक्षा से विन्ध्य में अवन्ध्य (सफल)
दर्शना देवी भ्रमरवासिनी¹ के दर्शन की इच्छा की ।
उल्लेख है । देखो सीता के अन्वेषण में जटायु वध
के पश्चात् राम लक्ष्मण वन में घूम रहे थे । क्रौंच
वन के पूर्व घोर तीन कोस पर स्थित मातंग मुनि
का आश्रम था । वहां उन्होंने भयंकर ध्वनि सुनी ।
यह ध्वनि कबंध की थी। उसने एक कोस दूर से ही
राम लक्ष्मण को देखा। कबन्ध उन्हें भक्षण करने के
लिये बढ़ा । रामने बायां तथा लक्ष्मण ने दाहिना
हाथ कबंध का पकड़कर तोड़ दिया । गतप्राण होकर
वह गिर पड़ा । उसके शरीर से देदीप्यमान पुरुष
निकला । वह आकाश में स्थित हो गया। राम के
प्रश्नपर उत्तर दिया, 'मैं विश्वावसु नामक गन्धर्व
हूँ । शाप के कारण राक्षस योनि प्राप्त हुई थी।'
३९१ (१) विष्णु शक्ति—विष्णु की क्रियात्मक
शक्ति से यहाँ तात्पर्य है। यह शक्ति स्वयं लक्ष्मी है।
३९३ (१) कितव जन : यह सूक्ति है ।
कल्हण ने यहाँ जुआड़ियो के विषय में उक्त सूक्ति
कही है । मरते दम तक जुआड़ी अपने दाव तथा
लाभ की चिन्ता करते रहते हैं ।
३९४ (१) भ्रमर वासिनी—यह दुर्गा का ही
एक रूप है। इनको विन्ध्यवासिनी भी एक मत
मानता है ।
कवि वाक्पति ने अपनी प्राकृत कविता में इस
भ्रमरवासिनी देवी से मिलता जुलता वर्णन
किया है।
दुर्गासप्तशती में भ्रामरी देवी का वर्णन मिलता
है । कल्हण ने निस्सन्देह भ्रमरवासिनी देवी का
यहाँ उल्लेख उसी के सन्दर्भ में किया है । दुर्गा ने
स्वयं तीनों लोकों के हित के लिये ६ पदों वाले