राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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अथाश्वपादेनेशाननिर्देशात्तत्क्षणागतः ।
काश्मीरिको जयन्ताख्या द्विजन्माऽयोजि पार्श्वगः ॥ ३६६ ॥
३६६. अश्वपाद ने ईशान निर्देश पर तत्क्षण आये काश्मीरी जयन्त नामक विप्र
को जो कि समीप में था नियुक्त किया।
श्रान्तोऽस्यध्वन्य नान्यस्माद्देशात्तेऽभिमतं भवेत् ।
राज्ञे प्रवरसेनाय लेख एष प्रदर्श्यताम् ॥ ३६७ ॥
३६७. 'पथिक' तुम श्रान्त हो। अन्य देश (स्थान) से तुम्हारा अभिमत (वाञ्छित)
होना सम्भव नहीं है अतएव यह लेख राजा प्रवरसेन को दिखाओ।
इत्युक्त्वार्पितलेखोऽसावसमर्थः पथः पृथून् ।
गन्तु प्रस्थानखिन्नोऽस्मि सद्यस्तेनेत्यगद्यत ॥ ३६८ ॥
३६८. यह कहकर उसे लेख अर्पित करने पर उस (जयन्त) ने इस प्रकार कहा—
"यात्रा से श्रान्त मैं सद्यः अधिक मार्ग चलने में असमर्थ हूँ।"
स्नाह्यद्य तावत्त्वं स्पृष्टो द्विजः कापालिना मया ।
उक्तेति तेन क्षिप्तोऽसावासन्ने दीर्घिकाजले ॥ ३६९ ॥
३६९. 'तुम द्विज, मुझ कापाली द्वारा स्पृष्ट हो, अतएव 'आज अद्य स्नान करो'—
यह कहकर अश्वपाद ने समीपवर्ती दीर्घिका में इसे फेंक दिया।
उन्मीलितेक्षणोऽद्राक्षीत्स्वं स्वदेशादथोत्थितम् ।
तस्थुषश्चार्चने राज्ञा भृत्यान्यग्राञ्जलाहृतौ ॥ ३७० ॥
३७०. आँख खुली तो उस (जयन्त) ने अपने को स्वदेश (कश्मीर) में खड़ा
(उत्थित) एवं अचनारत राजा के भृत्यों का जल लाने में व्यग्र देखा।
स्वमावेदयितु नद्या नीयमाने नृपान्तिकम् ।
अन्वाक्षिपोऽक्षिपल्लेखं स स्नानकलशे ततः ॥ ३७१ ॥
३७१. तदनन्तर स्व को विदित करने के लिये, नृप के निकट नदी से ले जाते हुए
स्नान कलश में लेख अविलम्ब डाल दिया।
प्रवरेशं स्नापयता स्रस्तं तत्कलशात्पुनः ।
राज्ञा लेखं वाचयित्वा जयन्तः प्रापितोऽन्तिकम् ॥ ३७२ ॥
३७२. प्रवरेश (लिंग) का स्नान कराते हुए, राजा ने कलश निपतित, लेख को
वाच कर, जयंत को समीप बुलाया।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३६६ में 'निद्दे' का 'निद' तथा श्लोक संख्या ३६७ में 'ध्वन्य' का पाठभेद
'श्मीरिको' का पाठभेद 'श्मीरको' मिलता है। 'ध्वनि' तथा 'शास्ते' का पाठभेद 'शतो' मिलता है।