राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें५५३ राजतरंगिणी
भक्त्या प्रतिष्ठां प्राक्तस्मिन्निनीषौ प्रव्ररेश्वरम् ।
जयस्वामी स्वयं पीठे भित्त्वा यन्त्रमुपाविशत् ॥ ३५० ॥
३५०. उसके भक्ति पूर्वक प्रवरेश्वर १ की प्रतिष्ठा करने के पूर्व जयस्वामी २ स्वयं
यन्त्र भेदन कर पीठ पर आसीन हो गये ।
सन् १९६२ में जब मैं दूसरी बार आया त सीढ़ियाँ
बन चुकी थीं ।
शिखर पर स्थित शारिका देवी के समीप पहुँचने
के लिये जहाँ से सीढ़ियाँ प्रारम्भ होती है वहाँ एक
आधुनिक मन्दिर बना है। मन्दिर के बाहर शिवलिंग
है। भीतर देवी की मूर्ति है। मन्दर के नीचे सड़क
के समीप पाँच या सात ब्राह्मणों के मकान हैं।
यहाँ एक ढका हुआ हौज बना है। यहाँ से जनता
पीने का जल प्राप्त करती है।
शारिका मन्दिर बाहर से देखने पर हरिपर्वत
दुर्ग के अन्दर एक दुर्ग अथवा किला मालूम पड़ता है।
राजा गुलाब सिंह ने कश्मीर विजय के पश्चात्
इसका निर्माण कराया था।
शारिका देवी की यहाँ कोई मूर्ति नहीं है। एक
शिला खण्ड खड़ा है। उस पर श्रीचक्र अंकित है।
वह सिन्दू लेपन से इतना ढक गया है कि रेखायें
स्पष्ट प्रकट नहीं होतीं।
पुजारियों का कथन है कि श्रीचक्र की रेखायें
कभी-कभी स्वतः उमड़ आती हैं। दिखायी पड़ने
लगती है। मैने चक्र के कोनों को गिनना चाहा।
परन्तु कुछ को छोड़कर अन्य सिन्दूर के मोटे स्तर
से ढक गये हैं।
दूर से देखने में शिलाखण्ड का रूप शारिका
पक्षी के आकार तुल्य लगता है। उस पर श्रीचक्र
अंकित कर देव स्थान तथा मूर्ति का नाम शारिका
रख दिया है।
शारिका माहात्म्य में एक कथा कही गयी है।
देवी दुर्गा ने मैना का रूप धारण कर लिया था।
सुमेरु पर्वत से पर्वत खण्ड देवी अपने चंचु मे उठाकर
लायी। वह दैत्यों के द्वार को बन्द करना
चाहती थी।
दैत्य लोग नरक में निवास करते थे। परन्तु इस
स्थान पर नरक जाने का द्वार अर्थात् मार्ग था। उसी
द्वार पर पर्वत खण्ड रख दिया। दैत्यों का इस द्वार
से निकलना बन्द हो गया। द्वार का मुख भी बन्द
हो गया। देवी स्वयं इस पर्वत पर निवास करने
लगी। पर्वत का नाम हर पर्वत हो गया।
कथासरित्सागर ७३ : १०९ में इसका
उल्लेख है।
(३) अट्टा : इस शब्द का उल्लेख राज-
तरंगिणी मे पुनः नही मिलता। नीलमत पुराण मे
भी मैं इस शब्द को नही पा सका। अट्टा का डिग्दी
अर्थ मचान होता है। स्टीन ने एक सुझाव दिया है
कि मट्टा कवि भाषा में ऊँचे किंवा श्रृंग, शिखर के
लिये यहाँ प्रयोग किया गया है। अट्टालिका ऊंचे कई
मञ्जिले मकान को कहते है। अट्टमेलक एक मन्त्री
का उल्लेख रा० ८:५७७ मे कल्हण ने किया है।
३५० (१) प्रवरेश्वर : हरिपर्वत के मूल तथा
जामा मसजिद, जो अब जियारत बहाउद्दीन साहब के
नाम से सुप्रसिद्ध, के मध्य होना चाहिये। यह स्थान
सम्भवतः श्रीनगर के मध्य में होगा। जियारत बहाउद्दीन
साहब के समीप जो घेरा जो पुराना कब्रिस्तान है
उस में मन्दिरों तथा देवस्थानों के अनेक अलंकृत
शिलाखण्ड आज भी लगे दिखायी देते हैं। उस के
दीवाल तथा कब्रों में वे लगे हैं।
कब्रिस्तान के नैऋत्य कोण में एक पुराना
फाटक खड़ा है। वह बहुत ऊँचा है। चौड़ा भी
काफी है। वह बड़े शिलाखण्ड से बनाया गया है।