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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 723, कुल 984 में से

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पृष्ठ 723

५४८ राजतरंगिणी
हेतुंस्तुदीर्य विविधानमन्वानं पराजयम् ।
सप्त वारान्स तत्याज जित्वा मुम्मुनिभृभुजम् ॥ ३३२ ॥
३३२. विविध हेतुओं को कहकर पराजय न मानने वाले राजा मुम्मुनि' को सात बार
विजित कर उसने छोड़ दिया ।
उसमें सिंहासन जैसे महत्त्वपूर्ण वस्तुका उल्लेख नहीं
मिलता ।
नादिरशाह भारत का तख्तेताऊस उठा ले गया
था । वह ऐतिहासिक घटना हैं। वह ईरान में
आज भी मौजूद हैं ।
एक यह सम्भावना हो सकती है। कश्मीर
लकड़ी की नक्कासी के काम के लिये प्रसिद्ध हैं।
भारत में आज भी यहाँ से टेबुल, कुर्सी, मेज,
दीपदान, तस्तरी, आदि लकड़ी के सामान भारत
के बड़े शहरों में बिकते हैं । कश्मीर में भी
विक्रमादित्य अथवा उसके पूर्वजों के लिये सिंहासन
बनाया गया होगा । वह उज्जैन भेजा गया होगा ।
किसी देश का सिंहासन विदेश अथवा पर राजा के
यहाँ भेजना उसकी पराजय स्वीकार करने के
समान हैं ।
प्रवरसेन ने सम्भवतः यह बात सुनी होगी ।
उसे बुरा लगा होगा अतएव वह सिंहासन उठा
लिया होगा।
कश्मीर लकड़ी की कला में प्रवीण समझा
जाता था । आज भी उसकी वही ख्याति है ।
अप्सरा की मूर्ति पत्थरों पर, दीवारों तथा छज्जो के
नीचे पत्थरों को सहारा देने के लिये लगायी जाती
है। कुर्सियों तथा मेजों के पाया के स्थान पर मछली,
सिंह, हरिण, स्त्री की मूर्ति काष्ठ अथवा पत्थर में
बना दी जाती है। सिंहासन को देवी महत्त्व देने के
लिये अप्सराओं की काष्ठ मूर्तियाँ सिंहासन के पाया
के स्थान पर चारो ओर लगा कर सिंहासन को
अत्यन्त सुन्दर बना दिया गया होगा ।
३३२ (१) मुम्मुनि : यह अभारतीय
शब्द हैं। किसी वंश, जाति, किंवा कुल का नाम
प्रतीत होता है । ललितादित्य की विजय यात्रा के
सन्दर्भ में उनका स्थान तुषार और भोट्ट क्षेत्रों के
मध्य कहा गया हैं।
तरंग ४ : १६७ तथा ५१६ में मुम्मुनि का
उल्लेख कल्हण ने पुनः किया है । श्लोक ४:१६७ से
प्रकट होता है । ललितादित्य ने मुम्मुनि को तीन
बार परास्त किया था ।
जयापीड़ के सन्दर्भ में मुम्मुनि का पुनः
उल्लेख (त०४.५१६) में कल्हण ने किया हैं। रात्रि
में वे चाण्डालों के साथ पहरा देते देखे जाते हैं ।
तुषार किंवा तुखार प्रदेश वर्तमान बदख्शां हैं।
भोट्ट स्थान निस्सन्देह लद्दाख हैं । राजतरंगिणी में
भोट्ट शब्द सर्वदा लद्दाख तथा लेह के निवासियों के
लिये प्रयुक्त किया गया हैं।
मुम्मुनि को दरद जातीय समझना भ्रामक
होगा । उनका उल्लेख कल्हण ने सर्वदा अलग एक
जाति तथा भू अंचल के रूप में किया है । दरदो
तथा मुम्मुनों में भेद किया गया है। उन दिनो हूणों
के त्रास के कारण जो कतिपय मूल तुर्क वंशीय लोग थे
थे कश्मीर राज्य के उत्तरी सिन्धु उपत्यका में आ
गये होगे । इस प्रकार वे कश्मीर के प्रभाव व
क्षेत्र में आ गये थे ।
कल्हण ने तरंग ८:१०९० तथा ८:२१७९ में
मुम्मुनि शब्द का उल्लेख किया है। यहाँ मुम्मुनि संगत
का भ्राता कहा गया हैं। वह पहले विदेशियों की
तालिका में राजपुत्र रूप से रखा गया हैं। वह
पर्वतीय राजा था । राजा सुस्सल को सहायता किया
था । यह मुम्मुनि हिन्दू थे । सम्भव है काबुल के शाही
वंश के समान मुम्मुनि भो कश्मीर में आकर बस गये
थे । समाज में वे दालो के समान मिल गये-