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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 984 में से

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पृष्ठ 720

तृतीय तरंग ५४७
वैरिनिर्वासितं पित्र्ये विक्रमादित्यजं न्यधात् ।
राज्ये प्रतापशीलं स शीलादित्यापराभिधम् ॥ ३३० ॥
३३०. इसने शत्रुनिर्वासित विक्रमादित्यात्मज प्रतापशील अपर नाम शीलादित्य¹ को
उसके पैतृक राज्य पर बैठाया ।
सिंहासनं स्ववंश्यानां तेनाहितहृतं ततः ।
विक्रमादित्यवसतेरानीतं स्वपुरं पुनः ॥ ३३१ ॥
३३१. स्व वंशियों का सिंहासन¹ जो अपहृत था उसे विक्रमादित्य के नगर से यह
पुनः अपने पुर में लाया ।

[बायाँ स्तम्भ]
धर्मविजय की चर्चा की है। अशोक ने 'भेरी घोष'
के स्थान पर 'धर्मघोष' किया था। प्रवरसेन ने
सैनिक विजय के स्थान पर धर्मविजय की बात उठायी।
'भेरी घोष सैन्य शक्ति का परिचायक है। सैन्य शक्ति
पाशविक शक्ति का परिचायक है। रक्तपात का
का जनक है। प्रवरसेन ने उसके स्थान पर धर्म
विजय का नारा बुलन्द किया।
धर्मविजय क्षत्रियों का धर्म कहा है। धर्म की
रक्षा के लिए जो संघर्ष किंवा युद्ध होता है यह
रक्तपात नहीं अपितु धर्म की स्थापना निमित्त
होता है। महाभारत युद्ध को धर्मयुद्ध कहा गया है।
क्षत्रियों के लिए भी न्याय के, धर्म के आचारादि के
स्थान पर शस्त्र का आश्रय लेना अनुचित कहा गया
है। यही प्राचीन भारतीय युद्ध परम्परा थी।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३३० में 'न्यधात्' का पाठभेद
'व्यधात्' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
३३०. (१) शीलादित्य : प्रतापशील उपनाम
शीलादित्य मालवा के राजा शीलादित्य थे। हुआ-
नत्सांग कहता है कि उसके भारत आगमन के ६० वर्ष
पूर्व वह हुआ था। परोक्षरूप से उसे विक्रमादित्य का
उत्तराधिकारी बताता है। प्रोफेसर श्री एम. मुल्लर
शीलादित्य का अनुमानित समय सन् ५५० से ६००
ई० लगाते हैं ।

[दायाँ स्तम्भ]
३३१ (१) सिंहासन : विक्रमादित्य के
सिंहासन के सन्दर्भ में यह श्लोक कहा गया है। यह
मत सर्व श्री ड्रोयर तथा लास्सेन पाश्चात्य इतिहास-
विदों का है। वह विक्रमादित्य का वही सिंहासन
है जिसके सम्बन्ध में अनेक गाथायें प्रचलित हैं।
'सिंहासन बत्तीसी' भी इसी सिंहासन से सम्बन्धित
की गई है।
बत्तीस पुतलियो अर्थात् अप्सराओ पर निर्मित
सिंहासन के सम्बन्ध में अनेक गाथायें हैं। यह
प्रतीत होता है कि विक्रमादित्य के पश्चात् यह
सिंहासन उज्जैन में नहीं था। किन्तु यह कहा
जाता है कि राजा भोज ने उसे पुनः प्राप्त किया
था । किन्तु इसका ऐतिहासिक सप्रमाण पता
नही लगता ।
कल्हण ने यहाँ एक विचित्र प्रश्न उपस्थित कर
दिया है। उसके अनुसार कश्मीर निर्मित राज-
सिंहासन विक्रमादित्य के नगर उज्जैन चला गया
था। वह किस प्रकार श्रीनगर से अवन्ती पहुँचा इस
पर कल्हण ने कही नही प्रकाश डाला है। विक्रमादित्य
अथवा उज्जैन के किसी राजा ने कश्मीर विजय नही
किया था। किसी राजा के सन्दर्भ में यह भी
नही कहा गया है कि उसने विक्रमादित्य की अधी-
नता स्वीकार कर ली थी। भेंट में सिंहासन विक्रमा-
दित्य अथवा उसके पूर्वजों को दिया था। मातृगुप्त
ने भेंट अवश्य विक्रमादित्य को भेजा था परन्तु