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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 718

तृतीय तरंग ३१३
राजा प्रवरसेनोऽथ नमयन्नवनीश्वरान् ।
अकृच्छ्रोल्लङ्घ्याः ककुभो दृढस्य यशसो व्यधात् ॥ ३२४ ॥
राजा प्रवरसेन द्वितीय का अभियान :
३२४. राजा प्रवरसेन ने अवनीशों (भूपालों) को झुकाते हुए, प्रवृद्ध यश द्वारा
दिशाओं को बिना कष्ट के लंघनीय बना दिया।
पातालोल्लङ्घितोर्वीभृत्कुम्भोनिर्जिताऽनयत् ।
यस्य प्रतापः प्रसभन्भुवनानि प्रसन्नताम् ॥ ३२५ ॥
३२५. जिस प्रकार समुद्र पान एवं पर्वत लंघन कर्त्ता (कुम्भोनि) अगस्त्य' बल
निर्मद करते हैं उसी प्रकार उदय होते उसके प्रताप ने भुवनों को प्रसन्न किया ।