राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५४३
असाधारणमौदार्यमाहात्म्यं तस्य भूपतेः ।
भोगमात्रकृते मादृग्विधः साधारणतां नयेत् ॥ ३१४ ॥
३१४. 'उस नृपति के असाधारण औदार्य माहात्म्य को भोग मात्र के लिये, क्या
साधारण कर दूँ ?
अपि च स्पृहयालुः स्यां भोगेभ्यो यदि भूपते ।
ध्रियमाणेऽभिमाने मे केन ते विनिवारिताः ॥ ३१५ ॥
३१५. 'भूपते ! यदि मैं भोगों' के लिए इच्छा करूं, तो मेरे स्वाभिमान के रहते, उन्हें
(भोगों को) कौन रोक सकता है ?
यन्ममोपकृतं तेन तद्विना प्रत्युपक्रियाम् ।
जीर्णमेवाधुनाऽङ्गेषु प्रभवत्वेष निश्चयः ॥ ३१६ ॥
३१६. 'उसने मेरा जो उपकार किया है, वह बिना प्रत्युपकार के यह निश्चय है कि
अब (मेरे) अंगों में जीर्ण हो जायगा ।
या गतिर्भूर्भुजोऽमुष्य मया तामनुगच्छता ।
पात्रापात्रविवेकृत्वख्यातिर्नेया प्रकाशताम् ॥ ३१७ ॥
३१७. "उस भूभुज का जो आचरण था उसका अनुसरण करने वाले मुझे पात्रापात्र
विवेकशीलता की ख्याति प्रकाश में लानी चाहिये ।
एतावत्येव कर्तव्ये यातेऽस्मिन्कीर्तिशेषताम् ।
भोगमात्रपरित्यागाद्विदध्यां सत्यसंधताम् ॥ ३१८ ॥
३१८. 'इतना ही कर्तव्य कर इसके दिवंगत हो जाने पर (कीर्ति शेष) अब भोग मात्र
के परित्याग से अपनी सत्यसंधता सिद्ध करूँगा।"
इत्युक्त्वा विरते तस्मिञ्जगाद जगतीपतिः ।
त्वदीया न मया स्पृश्यास्त्वयि जीवति संपदः ॥ ३१९ ॥
३१९. ऐसा कहकर उसके विरक्त हो जाने पर जगतीपति (प्रवरसेन) ने कहा-
'तुम्हारे जीवित रहते, मैं तुम्हारी सम्पत्तियों का स्पर्श नहीं करूंगा।'
पाठभेद : करता, तो उनका भोग बिना स्वाभिमान त्याग किये
श्लोक संख्या ३१५ में 'मे' का पाठभेद 'ते' कर सकता था । जैसा कि वह प्रवरसेन से पुनः
मिलता है । राज्य प्राप्त कर सकता था ।
पादटिप्पणियाँ : पाठभेद :
३१५ (१) भोग : मातृगुप्त के मुख से कल्हण श्लोक संख्या ३१७ में 'श्यताम्' का पाठभेद
ने कहलवाया है। यदि यह भोग की आकांक्षा 'सताम्' मिलता है ।