राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५२१
अथ ग्रथयितुं तस्मिन्पुस्तकं प्रस्तुते न्यधात् ।
लावण्यनिर्याणभिया तदधः स्वर्णभाजनम् ॥ २६१ ॥
२६१. जब वह पुस्तक समेट रहा था—तो उसके नीचे स्वर्णपात्र, लावण्य¹ परिगलन
भय से राजा ने रख दिया ।
अन्तरज्ञतया तस्य तादृश्या कृतसत्कृतिः ।
भर्तृमेण्ठः कविर्मेने पुनरुक्तं श्रियोऽर्पणम् ॥ २६२ ॥
२६२. नृप की उस प्रकार की अन्तरज्ञता से सत्कृत होकर कवि भर्तृमेण्ठ ने लक्ष्मी का
प्रदान पुनरुक्त ( निःप्रयोजन ) माना ।
किया है। उसने अपने पूर्वजन्मों में वाल्मीकि
भर्तृमेण्ठ तथा भवभूति होना लिखा है ।
बभूव वल्मीकभवः पुरा कवि-
स्ततः प्रपेदे भुवि भर्तृमेण्ठताम् ।
स्थितः पुनर्यो भवभूतिरेखया
स राजते सम्प्रति राजशेखरः ।
( बालरामायण )
विनिर्गतं मानदमात्ममन्दिरा
त्स सम्भ्रमेन्द्रद्रुतपातितार्गला ।
क्षेमेन्द्र ने सुवृत्ततिलक तथा मंख ने श्रीकंठ-
चरित ( २:५३ ) में मेण्ठ का उल्लेख किया है।
मंख ने उसे सुबन्धु, भारवि तथा बाण के समकक्ष
रखा है। सुभाषितावली में मेण्ठ की कविताओं
का उद्धरण दिया गया है। हेमचन्द्र ने अलंकार-
चूडामणि में हयग्रीव वध को काव्य माना है ।
काव्यप्रकाश तथा साहित्यदर्पण में मेण्ठ तथा
उसके काव्य का उल्लेख मिलता है । डाक्टर
श्री भाऊदाजी ने राघव भट्ट के शकुन्तला भाष्य में
मेण्ठ के पद्यों को पाया है।
कश्मीरी कवियों में मेण्ड अन्यतम कवि हैं ।
यह प्रबन्ध कवि हैं । राज्यसभा के कवि थे ।
हयग्रीव वध के श्लोक सूक्ति ग्रन्थों में उद्धृत हैं।
राजशेखर ने इन्हें वाल्मीकि का अवतार माना है।
अश्वशिरस् तथा हयग्रीव दोनों शब्दों का
उल्लेख पुराणों में मिलता है । महाभारत में उल्लेख
६७
आता है कि और्व का क्रोध समुद्र में निक्षेप हुआ
तो उसमें हयशिरस् की उत्पत्ति हुई । पुनः उल्लेख
मिलता है कि हयग्रीव नरक का सेनापति
था। भागवत पुराण के अनुसार विष्णु ने
हयग्रीव का वध किया था । ( ११:४:१७ ) विष्णु
तथा मारकण्डेय पुराण में उल्लेख है कि भगवान्
विष्णु भद्राश्व में हयशिरस् रूप से उत्पन्न हुए थे ।
( विष्णु० १:२:५० ; मारक० ५५ ) कालिका
पुराण के अनुसार हयग्रीव ने ज्वरासुर को मारा था ।
( कालिका० ८१:९६ ) देवी भागवत में विष्णु
हयग्रीव ने असुर हयग्रीव का वध किया था
( देवीभागवत १:४ ) ।
असमी साहित्य में उल्लेख मिलता है कि ऋषि
उर्व के कहने पर विष्णु ने हयासुर, जो मणिकूट
पर निवास करता था, वध किया था । अन्तिम
समय असुर ने प्रार्थना की कि भगवान् स्वयं
हयसुर का रूप धारण कर मणिकूट पर निवास करें।
नील मत में हयग्रीव अवतार का उल्लेख है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २६१ में ‘ग्रथयितुं’ का पाठभेद
‘ग्रन्थयितुं’ मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२६१ (१) लावण्य—लावण्य का लौकिक
अर्थ पानी है। स्त्री पर पानी है। मोती पर पानी
है। इसका अर्थ स्त्री पर लावण्य है किया जाता