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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 693, कुल 984 में से

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पृष्ठ 693

५२६ राजतरंगिणी
इत्थं स्थिते परं कंचिच्चदीयोऽस्मीति शंसता ।
न नेया भवता राजन्वयमात्मा च लाघवम् ॥ २४५ ॥
२४५. 'ऐसी स्थिति में हे राजन् ! किसी अन्य से 'तुम्हारा हूँ' यह कहकर आप
स्वयं तथा हम लोगों का गौरव लाघव न करें।'
इति तैस्तथ्यमुक्तोऽपि संस्मरन्स्वामिसत्क्रियाम् ।
मातृगुप्तो महीपालः क्षणमासीत्कृतस्मितः ॥ २४६ ॥
२४६. इस प्रकार उनके यथार्थ कहने पर भी महीपाल मातृगुप्त स्वामी के समादर को
स्मरण करते हुए क्षण भर सस्मित रहा ।
दानेन सुदिनं कुर्वन्नवराज्योर्जितेन सः ।
तत्रैव मङ्गलोदग्रं तदहो निरवर्तयत् ॥ २४७ ॥
२४७. उसने नव राज्योचित प्रचुर दान द्वारा मंगलमय उस दिन को सुदिन करते हुए
( उसे ) वहीं व्यतीत किया ।
पुरप्रवेशायान्थेद्युरभ्यर्थ्यमानोऽथ मन्त्रिभिः ।
अद्भुतप्राभृतं दूतं राज्यदातुर्व्यसर्जयत् ॥ २४८ ॥
२४८. दूसरे दिन मन्त्रियों ने पुर प्रवेश हेतु प्रार्थना की। अद्भुत भेंट के साथ
दूत को राज्यदाता (विक्रमादित्य) के पास भेजा ।
देशौन्नत्यानुसारेण स्पर्धामिव च तां विदन् ।
स्वामिनो मनसि हीतः सागसं स्वममन्यत ॥ २४९ ॥
२४९. देश की समृद्धि के अनुसार उसे स्वामी की स्पर्धा तुल्य जानते हुये, मन में
लज्जित हुआ और अपने को अपराधी समझा ।
अथाहूयपरान्भृत्यान्वक्तुं सेवास्मृतिं प्रभोः ।
अल्पार्घाण्यपि सात्म्यानि प्राहिणोत्प्राभृतानि सः ॥ २५० ॥
२५०. उसने प्रभु की सेवा स्मृति को कहने के लिये दूसरे भृत्यों को बुलाकर स्वल्प
मूल्यों के भी (नृप के) तदनुरूप भेंट भेजा ।
श्लोक संख्या २४५ में 'परं' का 'अपरं'; 'कंचि' श्लोक संख्या २५० में 'अल्पार्घाण्य' का 'अल्पा-
का 'क्वचि' 'किंचि' तथा 'राजन्' का पाठभेद 'राजा' र्ध्याण्य, 'अनर्घ्याण्य' तथा 'सात्म्यानि' का पाठभेद
मिलता है । 'साद्यानि' तथा 'स्वात्म्यानि' मिलता है।