राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५२५
अथ स्नातानुसिक्ताङ्गं सर्वाङ्गामुक्तभूषणम् ।
व्यजिज्ञपस्तं राजानं क्रान्तगजासनं प्रजाः ॥ २४१ ॥
२४१. स्नान एवं अनुलेपन के पश्चात, सर्वांग भूषण भूषित हो सिंहासनारूढ़ होने पर,
प्रजा ने उस नृपति को ज्ञात कराया ।
अर्थितेन स्वयं त्रातुं विक्रमादित्यभूभुजा ।
निर्दिष्टः स्वसमानस्त्वं शाधि नः पृथिवीमिमाम् ॥ २४२ ॥
२४२. 'रक्षा हेतु प्रार्थित स्वयं भूभुज विक्रमादित्य ने आपको स्व तुल्य निर्दिष्ट किया
है । हम लोगों की पृथिवी पर शासन करें' ।
मण्डलानि विलभ्यन्ते येनानेन प्रतिक्षणम् ।
मा मंस्था मण्डलं राजन्विलब्धं तदिदं परैः ॥ २४३ ॥
२४३. 'हे राजन् ! इस मण्डल को दूसरों से प्राप्त होना मत जानिये, क्योंकि इस
राज्य के द्वारा प्रतिक्षण मण्डल प्राप्त होते रहते हैं ।
कर्मभिः स्वैरवाप्तस्य जन्मनः पितरौ यथा ।
राज्ञां तथाऽन्ये राज्यस्य प्रवृत्तावेव कारणम् ॥ २४४ ॥
२४४. "जिस प्रकार स्वकर्मों से प्राप्त जन्म के प्रति माता-पिता कारण होते हैं, उसी
तरह राजाओं के राज्य प्रवर्तन में अन्य लोग कारण होते हैं ।
पादटिप्पणियाँ :
२४० (१) विन्ध्या : नीलमत पुराण सात
कुल पर्वतों में एक विन्ध्या की भी गणना करता है।
नी० ५९६-६००
२४२ (१) श्लोक संख्या २४२-२४५ तक
स्वागत श्लोक है। कश्मीर में राजा तथा अभ्यागतों
के स्वागत की सुनिश्चित सुसंस्कृत एक शैली थी।
ओरंगजेब के कश्मीर आगमन काल में भी कश्मी-
रियो ने इसी प्रकार का स्वागत किया था। उसका
वर्णन थी बर्नियर करते है। उनकी समानता
हजारो वर्ष व्यतीत हो जाने पर भी मिलती है।
हम लोगों के कश्मीर पहुँचते ही भाटो से
बादशाह औरंगजेब ने कश्मीर के इस प्रिय भूमि
की स्तुति में कविता पाठ किया । बादशाह ने कविता
लेकर उन्हें मिहरबानी दिखाते इनाम दिया । जहाँ
तक मुझे स्मरण है उनमें एक ने परावृत मालाओ
की अपेक्षाकृत अधिक ऊँचाई में आकाश को आभूर्ण
रूप में परावृत कर दिया था जिसे हम देखते हैं।
प्रकृति ने अपनी पूरी शक्ति कश्मीर मण्डल को
सजाने मे समाप्त कर दी थी । उसे शत्रु सैन्यों से
आक्रमण हेतु दुर्भेय बना दिया था। पृथ्वी की
राजधानियो में रानी होने के कारण यह उचित
ही था कि उसे पूर्ण शान्ति तथा सुरक्षा युक्त रखा
जाय। इस प्रकार वह सार्वभौम राज सत्ता का
उपयोग करती रहे बिना कभी किसी के पराधीन
बनकर'।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २४३ में 'विलभ्यन्ते' का
'विदीयन्ते'; 'येनानेन' का 'येनैतेन' तथा 'विलब्धं
का पाठभेद 'विलक्षं' मिलता है।
श्लोक संख्या २४४ में 'पितरो' का 'पितरौ'
तथा 'राज्ञा' का पाठभेद 'राज्ञां' मिलता है।