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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

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पृष्ठ 684

तृतीय तरंग ५२१
क्रमवर्ताभिधाने स प्रदेशे प्राप्तवांस्ततः ।
ढक्कं काम्बुवनामानं योऽद्य शूरपुरे स्थितः ॥ २२७ ॥
२२७. तदनन्तर वह क्रमवर्त नामक प्रदेश में काम्बुव १ संज्ञक ढक्क २ पहुँचा जो आज
शूरपुर ( सोपुर ) में स्थित है ।
वितस्तातो महीनाथ न गंगा व्यतिरिच्यते । कश्मीर में ढक्क सैनिक चौकी अथवा वाच
केवलं जाह्नवीतोये पुरुषस्यास्थिसंभवः ॥ स्टेशन को कहते हैं। कश्मीर के इतिहास में ढक्क
॥ 1373:१५८७ ॥ के प्रबन्ध तथा रक्षा पर राजाओं ने बहुत जोर दिया
x - x x है। ढक्क के कारण कश्मीर में अवाञ्छनीय तत्त्वों
वितस्तातोऽधिको राजन् स्नानाद्यं तुल्यमेव च । का प्रवेश नही हो सकता था। ढक्क प्रायः दर्रों,
भागीरथेन संगत्यं पुरा राज्ञाऽवतारिता ॥ 1374:१५९०॥ प्रवेश स्थान तथा सैनिक महत्त्व के स्थान पर सुरक्षा
तथा नियन्त्रण की दृष्टि से बनाये गये थे ।
x x x अवन्तिवर्मा के मन्त्री शूर ने क्रमवर्त स्थि ।
गंगानदी शंभुजटाकलापं,
चंद्रेण देवेन तथा विभिन्ना । ढक्क को शूरपुर में स्थापित किया था। शूरपुर
प्रोक्ता नृलोके नृप चन्द्रभागा, वर्तमान हूरपुर किंवा होरपुर है। रामब्यार नदी
आयाति पुण्यं विततां वितस्ताम् ॥ 1391 ॥ की हरी भरी सुहावनी उपत्यका में स्थित है।
पाठभेद : ढक्क किंवा द्रंग पर्वतीय दर्रों के प्रवेश मुख पर
श्लोक संख्या २२७ में 'वर्ता' का पाठभेद सुरक्षा निमित्त निर्मित किये जाने थे। इसका काम
'वत्ता' मिलता है । बाहर से आने वाले सामान से चुंगी वसूल करना तथा
पादटिप्पणियाँ : देश की सुरक्षा दोनों से होता था। शूरपुर के चुंगी
२२७ ( १ ) क्रमवर्त : वर्तमान कमेंवन कोठ, का यह स्थान उस जगह देखा जा सकता है जहाँ
पीर पंतसल मार्ग पर है । बादशाह ज़ैनुल आबदीन ने अभिसार से आने वालों
के लिये शिविर किंवा पड़ाव अथवा छाउनी
( २ ) काम्बुव : वह ढक्क का नाम है। पीर- बनवाया था।
पंतसल मार्ग पर है । द्रंग का अर्थ रक्षा स्थान होता है। श्रीवर
ढक्क : इस शब्द का अर्थ रणजीत सीताराम ने उसे गुल्म भी कहा है। द्रंगिका, द्रामिका,
पण्डित ने डमस्टेशन (नगाड़ा की चौकी ) लगाया द्रंगिन आदि समानार्थक शब्द वल्लभी राजाओं के
है। उसे विरोचन किंवा अवलोकन चौकी कहा है। ताम्रपत्रों में प्रयुक्त किया गया है। पुराने मुग़ल
स्टीन ने इसका अर्थ सैनिक चौकी किया है। ढक्क बादशाही मार्ग पर यात्री के लिए बाज़ार, निवास
शब्द प्राचीन है। नीलमत पुराण में ढक्क शब्द आदि की सुविधा प्राप्त होती थी। यह पर्वतीय
मिलता है। वह एक नाग है। उस स्थान पर धुक्क व्यवधान पार करते ही किञ्चित् मैदान के पश्चात्
के स्थान पर धुक्क का भी पाठभेद मिलता है। मिलता है। कल्हण ने राजतरंगिणी में इसका
वीरभद्रात्तनी नागौ नागौ सारमपुक्ककौ । कई बार उल्लेख किया है।
रक्ताकश्च तथा चक्को गौशो चंड जगस्तथा ॥ मंख के कोश में द्रंग रक्षा स्थान का समानवाचक
221 : १०८७-१०८८ कहा गया है। द्रंग का कहीं-कहीं मार्गेश अर्थात्
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