राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 682, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५१९
अकृच्छ्रलङ्घ्याः पन्थानो वल्लभातिथयो गृहाः ।
उपानमन्गच्छतोऽस्य सत्क्रियाश्च पदे पदे ॥ २२४ ॥
२२४. गमन करते हुए इसे सुख पूर्वक लङ्घ्य मार्ग, अतिथि प्रेमी गृह एवं पग-पग
पर सत्कार प्राप्त हुये ।
इत्थं विलङ्घिताध्वा स लोलानोकहशाद्वलम् ।
मङ्गल्यार्दधेपात्राम ददर्शाग्रे हिमाचलम् ॥ २२५ ॥
२२५. इस प्रकार मार्ग पार कर वह चंचल वृक्षों से हरे एवं मंगल दधि¹ पात्र तुल्य
हिमाचल को देखा ।
सरलस्यन्दसुभगा गङ्गाशीकरवाहिनः ।
प्रत्युद्ययुस्तं मरुतः पाल्यायाः संस्तुता भुवः ॥ २२६ ॥
२२६. देवदारु वृक्ष के राल से सुभग बालनीय, भूमि से संस्तुत एवं गंगा¹ शीकर
वाही काश्मीरी समीरण इसका अभिनन्दन किया ।
श्लोक संख्या २२५ में 'ध्वा स' का 'काशं', उसके मध्य में रखी हरी दूर्वा से हरीभरी कश्मीर
'श्वास'; तथा 'नोकह' का पाठभेद 'नोकह' उपत्यका की उपमा दी है।
मिलता है । किन्तु यहां एक त्रुटि प्रतीत होता है । काव्य-
पादटिप्पणियाँ : शास्त्र के नियम के अनुसार उपमा उत्कृष्ट होनी
२२५ (१) दधि : जैसे ही बनिहाल पास चाहिये । उपमा मंगल दधि पात्र छोटा है । परन्तु
तथा पुराना मुगल मार्ग समाप्त कर मैदान निवासी उपमेय हिमालय विशाल है । बड़ा है । यह
पर्यटक कश्मीर उपत्यका का दर्शन करता है तो खटकता है ।
उसे तुषार मण्डित पर्वत शिखर का अभिराम दर्शन २२६ (१) गंगा-कश्मीर को अनेकानेक
मिलता है । उसका वह हिम दर्शन तथा हरीभरी स्रोतस्विनियां तथा नाग गंगा के रूप माने जाते हैं ।
उपत्यका उसमें अभूतपूर्व चेतना एवं भाव तरंगें कश्मीर की सिन्ध उपत्यका की सींचने और वितस्ता
उत्पन्न कर देती हैं । में मिलने वाली सिन्ध नदी को भी गंगा कहा गया
यहाँ तुषार की उपमा दधि से दी गयी है । है । पादटिप्पणी 'गंगा' पृष्ट १०० द्रष्टव्य है ।
उपत्यका के चारों ओर उत्तुंग पर्वत शिखर से परावृत नीलमत पुराण में निम्नलिखित गंगा का
है । वे तुषारमण्डित रहते हैं । उपत्यका हरीभरी उदाहरण मिलता है ।
रहती है । अतएव तुषार की उपमा कल्हण ने दधि जम्बूमागं तथा पुण्यं पुण्यां वाराणसीं तथा ।
से दी है । दूध जम जाने पर दही बन जाता है । तथैव जाह्नवीं गंगां देवीं गगनमेखलाम् ।।
जल जमने पर बर्फ हो जाता है । १०.१३१-१३२॥
दधि पात्र में दूर्वा मंगल कार्यों के समय में × × ×
रखा जाता है । कल्हण की यह उपमा अनोखी गंगासागरसन्धि च सिन्धुसागरसंगमम् ।
है । उसकी पैनी दृष्टि की यह द्योतक है । भृगुतुगं विशालां च कुब्ज.कां श्यतं तथा ।।१५:१३६॥
हिम परिवृत गोलाकार उपत्यका दधिपात्र से घोर × × ×