राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीय तरंग ५१५
उपायं यं पुरस्कृत्य सेवते सेवकः प्रभुम् ।
अनन्तरङ्गस्तत्रैव योग्यं तं किल मन्यते¹ ॥ २१४ ॥
२१४. 'सेवक जिस उपाय को अग्रसर करके प्रभु की सेवा करता है, अन्तरङ्ग ( नृप )
उसे उस ( कार्य ) योग्य मानता है।
सुखार्थी नागारिप्रतिभयशमात्प्रत्युत सुखं
जहौ शेषस्तल्पीकृततनु निषेव्यासुररिपुम् ।
यतस्तेनामुष्मिन्नधिगतवता क्लेशसहतां
श्रमाधायि न्यस्तं निरवधि धराभारवहनम् ॥ २१५ ॥
२१५. 'नागरिपु ( गरुड़ ) के भय शमन से सुखाकांक्षी शेष नाग शरीर की शय्या
बना, ( कर ) विष्णु की सेवा करके; प्रत्युत सुख का त्याग ( ही ) कर दिया । क्योंकि (उन्होंने)
क्लेश सहन करने में समर्थ मानकर , इनपर श्रम प्रद पृथ्वी का भार सदैव के लिये न्यस्त कर
दिया ।
अयमेतद्गृहीतेषु गुणवत्सु गुणाधिकम् ।
आत्मानं गुणवान्पश्यन्नास्थ्यैनमशिश्रियत्¹ ॥ २१६ ॥
२१६. 'उन गृहीत गुणवानों में स्वयं को अधिक गुणवान देखते हुये, इसने आस्था
पूर्वक उसका ( नृप का ) आश्रय लिया था ।
अनन्तरङ्गः कोऽन्योऽस्माद्गुणान्दर्शयतेऽधिकान् ।
अस्मै गुणवते पूजां यश्चकार किलेदृशीम् ॥ २१७ ॥
२१७. अन्तर को न जानने वाला अन्य कौन इससे अधिक गुणवान ( गुणज्ञ ) हैं ।
जिसने इस गुणवान् की इस प्रकार पूजा की ।
पाठभेद : पादटिप्पणियाँ :
२१४ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह
श्लोक संख्या २१४ में 'उपायं यं' का पाठभेद ६५वाँ श्लोक है ।
२१६ ( १ ) राजतरंगिणी सूक्तिसंग्रह का यह
'उपायं त' तथा 'उपायनं' मिलता है । ६६वाँ श्लोक है ।