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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 594, कुल 984 में से

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पृष्ठ 594

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द्वितीय तरंग

[बायाँ स्तम्भ]

आर्य भोजपत्र है। कश्मीर में यह बहुत होता है।
जोजिला पास के समीप इसके वृक्ष खूब मिलते हैं।
प्राचीन काल में यह कागज के स्थान पर प्रयुक्त
किया जाता था। परन्तु गृह त्यागी संन्यासी अथवा
मग्न गण इसका वस्त्र बनाकर भी पहनते थे। हवन
के काम में भी इसका प्रयोग किया जाता है। यह
पवित्र माना गया है। भोजपत्र के बने पहनने के
साधनों को वल्कल कहा जाता था। भोजपत्र पर
चन्दन तथा केसर से तान्त्रिक यन्त्र और कवच लिख
कर ताबीज के ढंग पर पहनने की प्रथा थी,
और है।

उर्ध्व काबुल उपत्यका में स्तूपों से भोजपत्र पर
लिखे गये अभिलेख प्राप्त हुए हैं। सन् १८९२ ई० मे
फ्रेंच अन्वेषक श्री दुवरिगुल डी रहिन को खोतान से
बहुत दूर पर खरोष्ट्री भाषा में लिखे गये भोज
पत्र पर अभिलेख मिले थे। वह पाण्डुलिपि धम्म
पद की थी। प्राकृत भाषा में थी। मध्य एशिया
में संस्कृत पाली, प्रकृति और कुशान भाषा में ये
जर्मन रूसी तथा फ्रेंच विद्वानो को भोजपत्र पर
लिखे लेखादि प्राप्त हुए थे।

भोजपत्र कश्मीर से मध्य एशिया में भेजा
जाता था। भूर्जपत्र के वृक्ष लगभग १४००० फिट
ऊंचाई पर पाये जाते हैं। इसका भी नर एवं
मादा प्रकार होता है। नर शरद तथा मादा बसन्त
ऋतु में प्रकट होता है। भोजपत्र अनेक प्रकार के
होते हैं। उनमें कानू पीत, रक्त, कृष्ण, धूसर वर्ण
के मुख्य होते हैं। कानू भूर्ज पत्र को श्वेत भूर्ज
भी कहा जाता है। इसकी छाल श्वेत होती है।
यह पतली होती है। लिखने के लिये उत्तम मानी
गयी है। इस छाल से आभूषण, टोकरियाँ, प्यालो,
तश्तरी आदि बनाया जाता है। इसका सूगदो से
जूते के साँचे तथा फरमे भी बनाये जाते हैं।
हिमालय के अतिरिक्त उत्तरी अमेरिका, कनाडा
तथा उत्तरी यूरोप में मिलता है।
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[दायाँ स्तम्भ]

पीत भूर्ज पत्र को रजत भूर्ज पत्र भी कहते हैं
वृक्ष के वयस्क होने पर इसकी छाल धुंधले-धूसर
वर्ण की हो जाती है। यह लकड़ी का फर्नीचर,
खेती के औजार तथा गृहस्थी के कार्यों के लिये
अच्छा होता है। रक्त भूर्ज पत्र जलाशयों के समीप
मिलता है। इसे नदी भूर्ज पत्र भी कहते हैं। दल-
दली भूमि, सरोवरों, नदो के तटों पर वृक्ष उगते
हैं। इसके छाल का वर्ण पहले गुलाबी होता है।
तत्पश्चात् काला हो जाता है। इसके वृक्ष ५० से
६० फिट ऊँचे होते हैं। दक्षिण अमेरिका में
विशेषतया प्राप्त होता है।

कृष्णभूर्ज पत्र का वृक्ष ६० से ८० फिट ऊंचा
होता है। इसका शीर्ष शोभनीय होता है। शाखायें
पतली तथा टहनियाँ कोमल होती हैं। इसकी
लकड़ी कृष्ण वर्ण तथा कठोर होती है। फर्नीचर आदि
तथा गृहों के सजाने के लिये इसकी लकड़ी अच्छी
होती है। धूसर भूर्ज पत्र का वृक्ष ४० फिट से
अधिक ऊंचा नही होता। अमेरिका के अनेक
राज्यों में इसके वृक्ष मिलते हैं। छाल कड़ी और
परतें एक दूसरे के साथ मजबूती से चिपकी रहती
हैं। यह जलाने के काम में आता है। इसके साँचे
बनाये जाते हैं।

गुहागेह से इस स्थान पर बुमजू की गुफाओं
की ओर संकेत होता है। स्टीन ने बुमजू की गुफाओं
को इन गुहा गेहों को मानने में सन्देह किया है। यह
ठीक है। किन्तु हसन ने बुमजू ही की गुफा माना है।

मेरा मत है कि यह स्थान भ्रूज होम अथवा
ब्रजहोम है। इस स्थान पर खनन कार्य भारतीय
पुरातत्त्व विभाग की तरफ से हो रहा है। श्री
त्रिलोक नाथ खजाञ्ची कार्य कर रहे हैं। ब्रूज
होम एक छोटी सी पहाड़ी है। उसके प्रायः तीन
तरफ पर्वत माला है। श्रीनगर उत्तर दिशा में
पड़ता है।