राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४६ राजतरंगिणी
अचिन्तयच्च सत्यं मे संप्रीतो भूतभावनः ।
सिद्धिविघ्नानमूर्न्दीर्घानपाकर्तुं ममुद्यतः ॥ १५३ ॥
१५३. उसने विचार किया - 'वास्तव में इन महान् सिद्धि-विघ्नों का दूर करने के
लिये समुद्यत भूतभावन मुझ पर प्रसन्न हो गये हैं।'
कृत्येषु बहुनि निष्पाद्ये श्रमात्क्रोसीधमाश्रयन् ।
प्रावृषीवाध्वगो दिष्ट्या मोहितोऽगरेम न निद्रया ॥ १५४ ॥
१५४. "सौभाग्य से, अनेक निष्पाद्य कृत्यों के रहते, श्रम से आलस्य का आश्रय लेते
हुए, वर्षा कालीन पथिक सदृश, मैं निद्रा द्वारा मोहित नहीं हुआ।"
स्वकाले त्यजता लक्ष्मीं विरक्तां बन्धकीमिव ।
हठनिर्वासनक्रीडा दिष्ट्या नासादिता मया ॥ १५५ ॥
१५५. "सौभाग्य से, अपने काल में स्वैरिणी सदृश विरक्त, लक्ष्मी को त्यागते हुए,
मैंने बलात् निर्वासन क्रीडा को नहीं प्राप्त किया।"
शैलूषस्येव मे राजरङ्गेऽस्मिन् वल्गतश्चिरम् ।
निर्व्यूढावपि वैरस्यं दिष्ट्या न प्रेक्षका गताः ॥ १५६ ॥
१५६. "इस राज्य रूपी रंगमंच पर शैलूष (नट) सदृश, चिरकाल तक मैंने नृत्य
किया। सौभाग्य से उनकी समाप्ति पर भी दर्शक विरस नहीं हुए।"
दिष्ट्या सदैव वैमुख्यमुच्चैरुद्घोषयञ्श्रियः ।
त्यागक्षणे न भीतोऽस्मि विकत्थन इवाऽऽहवे ॥ १५७ ॥
१५७. सौभाग्य से, मैंने लक्ष्मी के प्रति विमुखता का सदैव उद्घोष किया, अतएव
इसके त्याग काल में, युद्ध के मध्य डींग हाँकने वाले की तरह, भयभीत नहीं हुआ।"
पाठभेद : स्यैव' 'विण्यूढावपि' का 'निर्व्यूढाम्' 'निर्व्यूडमपि'
श्लोक संख्या १५४ में 'श्रयन्' का 'श्रयम्' और तथा 'वैरस्यं' का पाठभेद 'वैराज्यं' मिलता है।
'क्रोसीद्य' का पाठभेद 'कौसीद्य' मिलता है। पादटिप्पणियां :
श्लोक संख्या १५५ में 'स्वकाले' का 'सुकाले' १५६ (१) निर्व्यूढ : निर्व्यूढ शब्द एक पारि-
'स्वकूले' तथा 'विरक्ता' का पाठभेद 'संरक्ता' भाषिक शब्द है। जिसका अर्थ होता है किसी कथावस्तु
मिलता है। का विश्लेषण करना। इसका अर्थ संस्कृत शब्द वस्तु
समान होता है। राजतरं० ३:१८६, ७:६०६ और
श्लोक संख्या १५६ में 'शैलूषस्येव' का 'शैलूप- ७:२७०७ द्रष्टव्य है।