राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४४४ राजतरंगिणी
तमन्तिकं पितुः प्राप्तं पत्न्या लक्ष्म्या च संश्रितम् ।
भुवा निमन्त्रयामासुर्मन्त्रिणो वंशयोग्यया ॥ १५१ ॥
१५१. पत्नी एवं लक्ष्मी से युक्त वह जब पिता के पास पहुँचा तब उसे मन्त्रियों ने
वंशानुरूप भूमि द्वारा आमन्त्रित किया ।
उसकी राजधानी प्राग्ज्योतिष थी । इसका नाम
मूर्ति लिंग भी आया है। इसके पाँच राज्यपाल
'हयग्रीव, निशंभु, पंचजन, विरूपाक्ष एवं मुर ये ।
यह इतना प्रबल हो गया था कि इन्द्र से उच्चैःश्रवा
अश्व एवं ऐरावत हाथी छीन लाया था। देवमाता
आदि के कुण्डलों का भी हरण कर लिया था ।
(म. स. ३८)
माता अदिति के कुण्डल को प्राप्ति का देवताओं
ने प्रयास किया । किन्तु विफल हो गये। प्राग्ज्योतिष
में असुरों का एक सुदृढ़ दुर्ग था। अजेय था। नर-
कासुर यहाँ निवास करता था। निर्मोचन नगर में
नरक तथा श्री कृष्ण का युद्ध हुआ। नरक पराजित
हो गया । (म. उ. ४८:८०-८४) कृष्ण ने उसके
पुत्र को राज्यसिंहासन पर बैठाया (भा०:१०:५९)
नरक ने पृथ्वी का अपहरण किया था । उसने
सम्पत्ति तथा अपहृत नारियों को मणिपर्वत पर
औदका नामक स्थान में रखा था ।
श्री कृष्ण तथा नरक की कथा हरिवंश पुराण
में दूसरे ढंग से दी गयी है। युद्ध प्रारम्भ पूर्व श्री
कृष्ण ने पांचजन्य शंख घोष किया । शंख घोष
सुनते ही नरक क्रुद्ध हो गया । क्रोध पूर्वक सर्वग
युद्धार्थ रथारूढ़ हो निकला । नरक का रथ अत्यन्त
विस्तृत मूल्यवान तथा अजय था । नरक का मस्तक
चक्र से भगवान् ने काट दिया । अदिति का कुण्डल
तथा प्राग्ज्योतिष का राज्य दोनों मुक्त हुए ।
(ह० प० २:६३, भा० १०:५९) श्री कृष्ण ने बन्दी
रखी नारियों को मुक्त किया (पद्म : उ० : २८८)
पद्म पुराण में भी यह कथा दी गयी है । उसमें
'नरक चतुर्दशी' का विशेष वर्णन किया गया है ।
यह दिन कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को पड़ता है। उसने
कृष्ण से वर माँगा था। उसको मृत्यु के दिन अर्थात्
नरक चतुर्दशी को सूर्योदय के पूर्व जो मंगल स्नान
करे उन्हें नरक की यातना न दी जाय ।
नीलमत पुराण में यह कथा अत्यन्त संक्षेप
में दी गयी है। वरुण की सभा में नरकासुर को
अत्यंत सम्माननीय स्थान प्राप्त था। उसे वहाँ पर
पृथ्वीपति कहा गया है। (म. स. ९:१२) नरक
को यहाँ पर छत्र प्राप्त हुआ था। उसी वरुण के
छत्र का उल्लेख कल्हण यहाँ करता है। प्राग्-
ज्योतिष में वह छत्र आया था। प्राग्ज्योतिष का
राजा उसका वंशज था। अतएव उसके कुल में
वह छत्र था।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १५१ में 'वंश' का 'वंग्य' तथा
'योग्यया' का 'योग्य वा' और 'योग्यवान' पाठभेद
मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
१५१ ( १ ) मन्त्री-शक्ति—कल्हण यहाँ एक
और उदाहरण कश्मीर की शक्तिशाली मन्त्री
परिषद् किंवा मन्त्री मण्डल का देता है।
सन्धिमान राजा था। उसके राजा रहते हुए
कश्मीर के मन्त्रियों ने मेघवाहन को कश्मीर की
भूमि देने का निश्चय किया। उसे कार्यान्वित भी
किया। औपचारिक रूप से मन्त्रियों ने उसे उसके
पूर्वजों के राज्य ग्रहण करने का निवेदन किया ।
मन्त्रिपरिषद् की शक्ति कश्मीर में कितनी शक्ति-
शाली थी यह इसी से प्रकट होता है। उन्हें किंचित्
मात्र संकोच नहीं हुआ कि सन्धिमान के मन्त्री
होते भी वे उसे राज्यच्युत करने का प्रयास कर
रहे थे । मन्त्रियों के सम्मुख जनता हित तथा राज्य