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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 580, कुल 984 में से

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पृष्ठ 580

द्वितीय तरंग ४३७
स चातिरम्यः काश्मीरो ग्रीष्मस्त्रिदिवदुर्लभः ।
हिमलिङ्गार्त्चनैः प्रायाद्वनान्तेषु कृतार्थताम् ॥ १३८ ॥
१३८. त्रिलोक दुर्लभ अति रम्य कश्मीर की ग्रीष्म ऋतु को उसने वनान्तों १ में हिम
लिंग की अर्चनाओं द्वारा कृतार्थ किया ।
फुल्लाब्जषण्डरुद्धाशाः प्राप्य पुष्करिणीतटीः ।
लक्ष्मीसखः स खण्डेन्दुचूडध्यानपरोऽभवत् ॥ १३९ ॥
१३९. लक्ष्मी-सखा वह प्रफुल्लित कमल दल से रुद्ध दिशाओं वाली पुष्करिणी तट
पर जाकर खण्डेन्दुचूड के ध्यान में मग्न हो जाता था ।१
अनुभव होता है । यद्यपि कल्हण स्पष्ट नही कहता
कि किस तिथि को यह उत्सव होता था । मेरा
अनुमान है कि यह उत्सव शिवरात्रि को मनाया जाता
रहा है। शैव तथा शिव भक्तो का यह सबसे बड़ा पर्व
होता है । शिवरात्रि के दिन स्नान तथा शिवलिंग
पर जल एवं पुष्प चढ़ाने का बड़ा महत्व होता है ।
धर्मप्राण प्राणी इस दिन निराहार व्रत रखते है ।
वसन्त की चर्चा सन्धिमान संगीत, नाटक,
तथा वसन्त ऋतु के साथ काम का पुष्प बाण के
साथ आगमन रूप में वसन्तोत्सव नहीं मनाता था ।
उसने काम तथा उत्सव के भौतिक रूप को आधा-
त्मिक रंग में रंग दिया था। वह वन में जाता था ।
पुष्प उद्यानो में जाता था । निर्झरों में स्नान करता
था । किन्तु देवार्चन हेतु करता था । उसने
मदनोत्सव को शिवोत्सव में परिणत कर दिया था ।
मदन का नहीं अपितु मदन दाहक शिव की उपासना
में जनता को लगा दिया था ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३८ में 'काश्मीरो ग्रीष्मस्त्रिदिव'
का पाठभेद 'काश्मीरोऽग्रीष्मस्त्रिदिव' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१३८ (१) वनान्तः : वनान्त से अर्थ उपत्यका के
सीमावर्ती वन प्रान्त है । राजा के समान सन्धिमति
मृगया के लिये वनों में, वन प्रान्त मे, वनान्त में नहीं
जाता था । अपितु वह हिमलिंग की अर्चना हेतु भ्रमण
करता था । शाब्दिक अर्थ वन का अन्त होता है ।
ग्रीष्म ऋतु कश्मीर की अत्यन्त सुहावनी होती
है । पुष्प खूब खिल जाते हैं। भूमि सुरम्य हरियाली
पूर्ण हो जाती है। सभी जलस्रोतों में जल उछलने
लगते हैं। इस समय उपत्यका के मैदान में हिम
लिंग मिलना कठिन हो जाता है । सन्धिमान वनान्त
में जाता था । जहाँ हिम मिलता था। ग्रीष्म ऋतु
में हिम दुर्लभ हो जाता है। उस दुर्लभ काल में
वह जहाँ हिम सुलभ होता था वहाँ जाता था।
हिम का लिंग बनाकर पूजा करता था। अथवा
जहाँ हिमस्वरूप शिवलिंग प्रकृति बना देती थी
वहाँ पूजा करता था । यह स्थान लगभग १० हजार
फिट की ऊँचाई पर होता था ।
कल्हण ने वनान्त का प्रयोग साभिप्राय किया है ।
ग्रीष्म ऋतु तक वरफ गल जाती है। मार्ग चारो
ओर का खुल जाता है। कश्मीर दर्शन का यह
सबसे अच्छा काल है। इसी काल में सन्धिमान
अपनी राजकीय यात्रा कश्मीर मण्डल के सुदूर स्थानों
में करता था । जनता का दुःख-सुख इस व्याज से
जानता था । सैनिक स्थान जो वनों के अन्त में
थे । वहाँ पहुँचता था । राज्य कार्य तथा राजधानी
के बाहर तुषारपात हीन ऋतु शिविर लगाने के लिए
उत्तम था । इसका उपयोग सन्धिमान ने आधा-
त्मिक तथा भौतिक दोनो कार्यों के लिये किया ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या १३९ में 'फुल्लाब्ज' का 'पुल्ला-
ब्जर' 'षण्ड' का पाठभेद 'रांड' मिलता है ।