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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 526, कुल 984 में से

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पृष्ठ 526

द्वितीय तरंग ३९१-
तस्मिन्विध्वंसयोद्धुक्तकालादृट्टहसितोपमे ।
न्यमज्जन् शालयः साकं प्रजानां जीविताशया ॥१९॥
१९. काल के अट्टहास सदृश, विश्व विनाश हेतु, उत्पन्न उसमें ( तुहिनपात में )
प्रजाओं की जीवित आशाओं के साथ, शालियाँ निमज्जित हो गयीं ।
अथाऽऽसीत्क्षुत्परिक्षामजनप्रेतकुलाकुलः ।
प्रकारो निरयस्येव घोरो दुर्भिक्षविप्लवः ॥२०॥
२०. क्षुधा से क्षीण जन-प्रेत-समूह-संकुल वह घोर दुर्भिक्ष विप्लव नरक¹ के प्रकार²
तुल्य लगता था ।
हैं । तुषार के आघात से बालें टूट जाती हैं। शीत
के कारण अधपकी शाली का पकना बंद हो जाता
है। वह नष्टप्राय हो जाती है। केवल पुवाल
तथा जीवनहीन शाली का दर्शन होता है।
कश्मीर में उन दिनों कृषी तथा ऊनी वस्त्र के
अतिरिक्त और कोई उद्योग-धन्धा नहीं था ।
शाली, मक्का, तथा फल एकमात्र जीवन यापन के
साधन थे । कश्मीर उपत्यका में बाहर से आने
वाला मार्ग पंजाब तथा बाहरी क्षेत्रों से दुर्गम है ।
अन्न यदि बाहर से उन दिनों घोड़ों, बैलों पर लाया
भी जाता था, तो बहुत महँगा पड़ता था । गरीबों
के साधन के बाहर उनका खरीदना हो जाता था ।
अन्न सरलतापूर्वक अधिक मूल्य देने पर भी नहीं
मिल पाता था ।
कल्हण इसी ओर इस श्लोक में संकेत करता
है । आजकल के विकसित सड़कों, हवाई
जहाजों, ट्रकों तथा रेलवे से उस समय की परि-
स्थिति पर विचार करना ठीक नहीं होगा । इन
साधनों से, वह समय साधनहीन एक प्रकार से
हिमालय की कुक्षि में था । जहाँ सभी कुछ कठिनता
से प्राप्त हो सकता था ।
कल्हण ने शाली नष्ट होने पर, जीवन के सहारा
न प्राप्त होने पर कश्मीर मण्डल की क्या अवस्था
हुई थी उसी पर अगले श्लोकों में अकाल का हृदय-
स्पर्शी अत्यन्त कष्टोत्पादक वर्णन किया है ।
पाठभेद :
श्लोकसंख्या २० में 'कुलाकुलः' का 'समाकुलः'
तथा 'प्रकारो' का 'प्राकारो' एवं 'प्रकरो' पाठभेद
मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२०. ( १ ) नरक : निरय शब्द का प्रयोग
यहाँ कल्हण ने किया है । उसका अर्थ नरक होता
है । स्वर्ग एवं नरक की कल्पना प्रायः सभी धर्मों
में प्राप्त होती है । स्वर्ग का विलोमार्थक नाम
नरक है । प्राचीन मान्यता के अनुसार मरणोत्तर
अधोलोक स्थान में या अवस्था में देव इत्यादि
द्वारा पापियों को उनके पाप तथा अपराधों का दण्ड
दिया जाता है। शीत प्रधान देशों में नरक की कल्पना
प्रायः हिमाच्छादित तथा उष्ण देशों में अग्नितप्त
लोकों में की गयी है । भारतीय मान्यता के अनु-
सार नरक दक्षिण दिशा अर्थात् यम की दिशा में
पाताल के निम्नतम भाग में माना गया है । लगभग
२८ नरकों की कल्पना की गयी है । यमराज
पाप पुण्य का निर्णय कर पापियों को विभिन्न नरकों
में भेजते हैं ।
ऋग्वेद में नरक का उल्लेख नही मिलता ।
ब्राह्मण काल में नरक की कल्पना मिलती है ।
अथर्व वेद में ( २ : १४ : २; ५ : १९ : ३)
नरक स्वर्ग के विपरीत यम के क्षेत्र रूप में अभीष्ट
है । वहाँ राक्षसियों तथा व्यभिचारिणियों का