राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 522, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंद्वितीय तरंग : ३८७
का पाठभेद 'चन्द्रको' और 'चर्मको' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
१६( १ ) द्वैपायन : व्यास पाराशर्य का नाम
द्वैपायन है । इनका जन्म यमुनाद्वीप में हुआ था ।
अतएव नाम 'द्वैपायन' पड़ा था । (म० आ० ५४:२)
इनकी माता का नाम काली था । अस्तु नाम 'कृष्ण
द्वैपायन' भी रखा गया था । भागवत पुराण में
उल्लेख आता है । वह स्वयं कृष्ण वर्ण थे । वर्ण के
कारण नाम कृष्ण द्वैपायन पड़ गया था । वैशाख
पूर्णिमा इनका जन्म दिन है । आषाढ पूर्णिमा को
व्यास पूर्णिमा मनायी जाती है ।
व्यास ने वेदों की पुनर्रचना की थी । इसलिए
उन्हें वेदव्यास कहा जाता है ।
'विव्यास वेदान् यस्मात्स तस्माद्व्यास इति स्मृतः।'
( म० आ० ५७ : ७३ । )
वायु पुराण में इन्हें 'पुराण प्रवक्ता' कहा गया
है ( वायु ६० : ११-२१; विष्णु धर्म : १७४ )
अत्यन्त कठोर तपस्या करने के कारण अनेकानेक
सिद्धियां प्राप्त किये थे । इन्होंने दूरश्रवण, दूर
दर्शन अनेक विद्याओं में प्रवीणता प्राप्त की थी ।
( म० आ० : ३७:१६ । )
कौरव पाण्डवो के पितामह थे । उनके महान्
हितचिन्तक रूप में उनका चरित्र चित्रण किया गया
है । जनमेजय के यज्ञ मण्डप में सर्प यज्ञ के समय
उपस्थित थे । वैशम्पायन ने अपने शिष्य को स्वरचित
महाभारत सुनाने का आदेश दिया था । ( म० आ०
५४ ) पाण्डवों के वनवास काल में युधिष्ठिर को
'प्रतिस्मृति विद्या' का उपदेश दिया था । ( म० व०
३७:२७-३० ) संजय को दिव्य दृष्टि प्रदान की
थी । संजय महाभारत युद्ध का आंखों देखा वर्णन
धृतराष्ट्र को सुनाते थे । ( म० भी० २:९ ) संजय
की दिव्य दृष्टि युद्ध के पश्चात् नष्ट हो गयी थी ।
(म० सौ० : ९:५८) घृताची अप्सरा से इनको शुक
नामक पुत्र प्राप्त हुआ था । ( म. आ. ५७:७४ )
किन्तु स्कन्द पुराण में शुक को जाबालि ऋषि की
कन्या वटिका से उत्पन्न कहा गया है । ( स्कन्द :
६८ : १४७-१४८ )
द्वैपायन चिरंजीवी हैं । वेदरक्षणार्थ उसका
विभाजन किये थे । पौराणिक साहित्य तथा
महाभारत का निर्माण किया था । (वायु०६०:१-१६)
वेद की चार स्वतंत्र संहिताओं को बनाया था ।
ततः स ऋच उद्धृत्य ऋग्वेदमकल्पयत् ।
( वायु० ६०:१९ ब्रह्माण्ड० ३:३४:१९)
व्यास की वैदिक शिष्य परम्परा है । ऋग्वेद की
शिष्य परम्परा में, पैल, बाष्कल ( इन्द्रप्रमति )
बोध्य, याज्ञवल्क्य, पराशर, माण्डूकेय, सत्यश्रवस्,
सत्यहित, सत्यश्री, शाकल्य, वाष्कलि, शाकपूर्ण,
पन्नगारि, शैशिरेय, वत्स, तथा दात बलाक हैं । ऋग्
वेद की २१ शाखाएँ हैं । उनमें केवल शाकल,
वाष्कल एवं सांख्यायन की संहिताएँ उपलब्ध है ।
शेष दो जिनका निर्देश प्राप्त है आश्वलायन एवं
मण्डूकायन है । आश्वलायन एवं सांख्यायन शाखाओं
के प्रवर्तक कौन आचार्य थे कहना कठिन है ।
व्यास को यजुर्वेद की वैदिक शिष्य परम्परा में,
वैशंपायन, याज्ञवल्क्य, प्रजापति, तित्तिरी, माध्यंदिन,
काण्व, श्यामाययाति, आसुरि एवं अलिम्प हैं ।
कृष्ण यजुर्वेद की ८६ शाखाओं में तैत्तिरीय,
मैत्रायणी, कठ एवं कापिष्ठल की सहिताएं प्राप्त है ।
शुक्ल यजुर्वेद की १५ शाखाएँ है । उनमें केवल काण्व
एवं माध्यंदिन उपलब्ध हैं ।
सामवेद की वैदिक शिष्य परम्परा में, जैमिनि,
सुमन्तु-जैमिनि, सुत्वन-जैमिनि, सुकर्मन्-जैमिनि,
पौष्पिण्ड्य, लोगाक्षि, कुथुमि, कुशीतिन्, लांगलि,
राणायनीय, सण्डिवुत्र, पराशर, भागवित्ति, सोम-
गायनी, पाराशर्य, प्राचीन योग, आमुरायण, तथा
पतंजलि हैं । सामवेद की १०० शाखाएँ हैं । उनमें
केवल कौथुम तथा राणायनीय संहिताएँ प्राप्त है ।
अथर्व वेद की शिष्य परम्परा में सुमन्त, कबन्ध,
पथ्य, देवादर्श, पिप्पलाद, जाजलि-शौनक, सैन्ध-