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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 515, कुल 984 में से

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पृष्ठ 515

३८२ राजतरंगिणी
पितुरेव समं कालं वृद्धिहेतोः स दिद्युते ।
विषुवत्पूर्णशीतांशुरिव शीतेतराचिषः ॥१०॥
१०. सूर्य के समकाल¹ तक शरदकालीन पूर्ण शशि तुल्य वह वृद्धि हेतु, पिता के ही
बराबर समय तक प्रकाशित रहा ।
अथ वाक्पुष्टया सार्धं देव्या दिव्यप्रभावया ।
भुवं तत्प्रभवो भुञ्जंस्तुञ्जीनोऽरञ्जयत्प्रजाः ॥११॥
तुंजीनः
११. तदुपरान्त इसका पुत्र तुंजीन दिव्य प्रभाव युक्त देवी वाक्पुष्टा के साथ पृथ्वी का
भोग करता हुआ प्रजारंजन किया ।
हसन लिखता है—बाद अजई ( प्रतापादित्य )
राजा जलोक शानो ने वादशाहत की पोशाक जैवतन
करके ३२ साल हकूमत में गुजारे ।
( १ ) जलौक, जलौकस्, जलौकास् : प्रसिद्ध
अनुवादकारो ने नाम को भिन्न प्रकार से लिया है ।
श्री रणजीत सीताराम पण्डित ने अपने अनुवाद में
जलौक तथा जलोकाः दिया है । श्री स्टीन ने
भूमिका के पृष्ठ १२५ पर 'जलौकस्' दिया है ।
अनुवाद में पृष्ठ ५७ पर पुनः 'जलौकस्' दिया है ।
श्री पण्डित ने अनुवाद के पृष्ठ प्रान्त ४२ पर 'जलो-
कस्' तथा अनुवाद में 'जलौक' और पुनः पृष्ठ ५८१
पर 'जलौकस्' दिया है। कल्हण ने मूल श्लोक में
'जलोकास्तत्सुतो' दिया है । क्रिया के अनुसार
'जलौकम्' शुद्ध प्रतीत होता है । इसके पूर्व (तरं०
१ : १०८) कल्हण ने 'भूभूज्जलोको' का प्रयोग
कर अशोक के पुत्र 'जलौक' का वर्णन किया है ।
प्रतीत होता है कि अशोकपुत्र 'जलोक' तथा प्रतापा-
दित्य-पुत्र में भेद जाहिर करने के लिए 'जलौकम्'
किंवा 'जलौकास्' नाम दिया है ।
१० (१) समकाल-ज्योतिष ज्ञान : कल्हण
को ज्योतिष का ज्ञान था इस श्लोक से प्रगट होता
है । दिन एवं रात्रि वर्ष में २३ सितम्बर तथा २२
मार्च को बराबर होते हैं । इस समय सूर्य निरक्ष
पर जाता है । भारतीय माग की गणना से
कात्तिक एवं चैत्र विषुव २२ या २३ सितम्बर तथा
महा विषुव या हरिद्विष २० मार्च को होता है ।
चन्द्रमा की वृद्धि तथा ह्रास का कारण विज्ञान
के अनुसार सूर्य है । यहाँ पर भी वृद्धि हेतु सूर्य को
कहा है । पिता भी पुत्र के लिये वृद्धि का हेतु है ।
यहाँ पर पिता को सूर्य तथा पुत्र को चन्द्रमा की उपमा
दी गयी है । चन्द्रमा का प्रकाश सूर्य का ही प्रति-
बिम्ब है और पिता का प्रकाश या प्रतिबिम्ब पुत्र ।
कल्हण ने यहाँ काव्य एवं ज्योतिष का संक्षेप में
समन्वय किया है ।
११(१) श्री विल्सन ने अभिषेक का काल ईसा पूर्व
१०४ वर्ष ९ मास तथा समीकृत का सन् ५४ ईस्वी
तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है ।
श्री स्टीन ने राज्याभिषेक का समय लौकिक
संवत् २९६० वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष दिया है
श्री एस. पी. पण्डित ने यह समय ईसा पूर्व
१०५ वर्ष तथा राज्य काल ३६ वर्ष रखा है ।
श्री वाली ने सप्तर्षि सं० ३८५३ तथा सन् ८३ ई.
यह काल दिया है ।
आइने अकबरी में तुंजन राजा को 'थुनजिर'
नाम से सम्बोधित तथा राज्य काल ३६ वर्ष
दिया गया है ।
हसन लिखता है—राजा तुंजीन २९५० क० में
बाप की जगह सल्तनतनशीन हुआ । उसकी रानी
वाक्पुष्ता नाम एक निहायत ही अकलमन्द और
दाना औरत थी, उसी की रहनुमाई में फौज और
रैयत के खुश करने में मसरूफ रहता । उनके साथ