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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 486, कुल 984 में से

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पृष्ठ 486

प्रथम तरंग ३५७
प्रभोः संकोचिताज्ञैस्तैश्चरद्भिनिरवग्रहम् ।
राज्यं जिहीर्षवो भूपाश्चक्रिरे भूम्यनन्तराः ॥३६१॥
३६१. प्रभु की आज्ञा संकुचित करने वाले तथा स्वच्छन्द, उन मन्त्रियों ने पार्श्ववर्ती भूपों
को राज्य हरण हेतु उत्सुक कर दिया ।
तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते नानादिगाश्रयाः ।
आसन्नाज्यामिषं प्राप्तुं श्येना इव ससंभ्रमाः ॥३६२॥
३६२ मन्त्रियों द्वारा प्रोत्साहित, नाना दिशाओं के वे सब नृप, बाज की भांति राज्य रूप
मांस की प्राप्ति हेतु समुद्यत हो गये थे ।
अथोत्पन्नभयो राजा न शशाक निजस्थितिम् ।
व्यवस्थापयितुं यन्त्रच्युतां कारुः शिलामिव ॥३६३॥
३६३. भयभीत राजा अपनी स्थिति को यन्त्र च्युत शिला को शिल्पी की तरह व्यवस्थित
रखने में असमर्थ हो गया ।

पाठभेद :
श्लोकसंख्या ३६१ में 'संकोचिता' का पाठभेद
'संकुचिता' मिलता है ।
श्लोकसंख्या ३६२ में 'तदनुप्राणिताः सर्वे ते ते'
का पाठभेद 'तदनुप्राणिता वैरि नृपा' मिलता है।

पादटिप्पणियाँ :
३६३ (१) यन्त्रः कश्मीर के मन्दिरों में लगे
विशाल शिलाखण्डों को उठाने के लिए किसी
प्रकार के यन्त्र का प्रयोग होता था । अन्यथा बड़े-बड़े
शिलाखण्डों को कैसे उठाकर एक दूसरे पर रखा
गया होगा । यह बात मन्दिरों के ध्वंसावशेषों के
देखने से मालूम होती है । कल्हण इसी शिला उठाने
वाले यन्त्र की उपमा यहाँ पर देता है। घिरारी
किंवा चर्खी बड़े शहतीर में लगाकर शिला उठाने की
क्रिया मन्दिरों के निर्माण निमित्त कश्मीर में प्रचलित
थी । यह यन्त्र, आधुनिक शब्दावली में क्रेन था ।
श्री आर. एस. पण्डित इस यन्त्र का यहाँ अर्थ
पानी उठाने वाले यन्त्र, अर्थात् ढेकली जिसके बांस
के एक छोर में पत्थर दूसरे में बालटी की लम्बी
रस्सी बंधी रहती है, और हाथ से पानी खींचते और
सिंचाई करते हैं, लगाया है। यह ढेकली प्रथा
बिहार, बंगाल, आसाम तथा कश्मीर में कुछ प्रचलित
रही है । यहाँ पत्थर गिरने से सन्तुलन बिगड़
जायेगा इस ओर उक्त मत से संकेत किया गया है ।
कल्हण ने यहाँ-'यन्त्रच्युता कारुः शिलामिव'
लिखा है। कारुः का अर्थ कारीगर होता है।
'कारुः' का अर्थ शिल्पी होता है। (अमर
कोश २:१०:५) शिल्पी के साथ कारु का प्रयोग
स्पष्ट प्रकट करता है कि कारु का अर्थ कारीगर से
है। यह यन्त्र पत्थर उठाने वाला यन्त्र है। न कि
रणजीत सीताराम पण्डित के शब्दों में ढेकली। ढेकली
कूपक चलाता है। यदि यन्त्र का सम्बन्ध जल
उठाने से होता है, तो कूपक अथवा कूपिसम्बन्धी
शब्द का प्रयोग किया जाता। कारु शब्द के प्रयोग
से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ। यह पत्थर उठाने
का यन्त्र था। जिसके भार के सन्तुलन के लिए यन्त्र
के चर्खी अथवा घिरारी के रस्सा या डोरी में एक
तरफ पत्थर लगा रहता था। इस प्रकार का यन्त्र
स्टेशनों पर कोयला ऊँचाई पर से जाकर रखने और
वहाँ से इंजन में डालने के लिए मैंने पश्चिमी रेलवे
में देखा है ।