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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 478, कुल 984 में से

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पृष्ठ 478

प्रथम तरंग ३५३
तेन क्रमागतं राज्यं सावधानेन शासता ।
अनुजग्मे मितं कालं पूर्वभूपालपद्धतिः ॥३५१॥
३५१. उसने क्रमागण राज्य का सावधानी पूर्वक शासन करता हुआ कुछ दिन तक
पूर्ववर्ती राजाओं की पद्धति का अनुकरण किया ।
काले कियत्यपि ततो यात्यभाग्यवशादसौ ।
सिषेवे श्रीमदद्वीवो यत्किञ्चनविधायिताम् ॥३५२॥
३५२. कुछ समय पश्चात् अभाग्य वश श्रीमद से उन्मत्त वह यत्किंचनविधायी' हो गया ।
नान्वग्रहीदनुग्राह्यान संजग्राह धीमतः ।
न प्रवृत्तोपचाराणां प्रागिवासीत्प्रियंकरः ॥३५३॥
३५३. वह अनुग्रह पात्रों पर अनुग्रह, धीमानों का संग्रह, तथा सेवारत सेवकों का पूर्ववत्
प्रियकर्त्ता नहीं रह गया था ।
दुर्विद्यपर्षदा सार्कं निर्विशेषं सभाजितैः ।
परिजह्ने स दुर्जातो जाततेजोवधैर्बुधैः ॥३५४॥
३५४. दुविद्य गण के साथ, निर्विशेष रूप से सम्मानित तथा अपमानित विद्वानों ने उस
दुर्जात राजा का त्याग कर दिया ।
सर्वत्र समदृष्टित्वं गुणोऽयं खलु योगिनः ।
अकीर्त्तिहेतुः स महान्दोषस्तु पृथिवीपतेः ॥३५५॥
३५५. सर्वत्र समदर्शिता योगियों के लिये गुण है किन्तु वह पृथ्वीपति की अकीर्ति का हेतु
तथा महान् दोष है ।

उसकी फौज और रैयत उससे मुतनफर हो गयी ।
आसपास के हुक्काम जो दिल और जान से राजा के
मतीअ और फरमांबरदार थे, एक एक करके इसके
बागी होने लगे । हकूमत के महल हल व अकदीद
जवान इसकी मजवलो पर मुताबिक हो गये । अहले
जमाना की यह बेमुरव्वती देखकर युधिष्ठिर दो-तीन
रकीबो के हमराह हिंदुस्तान की तरफ भाग गया ।
यहाँ एक राजा ने उसे पकड़कर जान से मार डाला ।
इसकी मुद्दत हकूमत बावन बरस और आठ माह
थी ।' पृ० ५०
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३५१ में 'अनुजग्मे' का 'मनुजग्मे'
तथा 'मितं' का पाठभेद 'सितं' मिलता है ।
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पादटिप्पणियाँ :
३५१ (१) पद्धति : यहाँ शासन पद्धति
अर्थ लगाना चाहिए । पूर्ववर्ती राजाओं की शासन
पद्धति का अनुकरण कुछ दिन तक राजा करता रहा ।
३५२ (१) यत्किंचनविधायी : राजा
स्वेच्छाचारी, उद्दण्ड, अकर्मण्य, उच्छृंखल, निरंकुश
तथा प्रविहित, अकरणीय कर्म करने वाला हो गया
था । कल्हण का यही तात्पर्य यहाँ प्रकट होता है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३५४ में 'परिजह्ने' का पाठभेद
'परिजिल्हे' मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
३५५. (१) समदर्शी : योगियों तथा सज्जनों के