राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ २६ ]
से अत्यन्त उच्चकोटि का हुआ है । ( रा० १ : २६-७२ ) राजा युधिष्ठिर तथा उसकी रानियाँ कश्मीर
भूमि का अन्तिमदर्शन कर विदा होती है तो देश प्रेम, देश वियोग का जो करुण चित्रण कल्हण ने किया है
यह विश्व-इतिहास के किसी भी साहित्य की अमूल्य निधि मानी जायगी । ( रा० १ : ३६६-३७३ )
कश्मीर के लिये कल्हण ने माता शब्द का प्रयोग किया है । ( रा० ३ : ८६ ) उसने कश्मीर मण्डल के
लिये 'काम्ब्य' शब्द का उल्लेख किया है । उसने कश्मीर देश तथा भूगोल वर्णन आपस में मिला दिया
है । पुण्यभूमि कश्मीर की गरिमा इतनी श्रद्धाभक्ति के साथ प्रगट की है कि उसे पढ़कर रोमांच हो जाता
है । ( रा० १ : ४३ ) उसकी देश भक्ति उस समय पराकाष्ठा पर पहुँच जाती है जब भगवान् श्रीकृष्ण के
मुख से एक पुरातन पुराण वचन उद्धृत कराया है—'कश्मीर पार्वती स्वरूप है और यहाँ का राजा हर का
अंश है ।' ( रा० १ : ७२ ) कृष्ण गोनन्द तथा दामोदर युद्ध का वर्णन, कश्मीर सेना का अभियान प्रेरणा
एवं स्फूर्तिप्रद पद कहे जायेंगे । ( रा० १ : ५७-५८ ) ।
कश्मीर की अजेय शक्ति पर गर्व करता कल्हण कहता है—'कश्मीर पर बल द्वारा नही केवल पुण्य
द्वारा विजय प्राप्त की जा सकती है । यहाँ के निवासी केवल परलोक से भयभीत होते हैं न कि शस्त्रधारियों
से ।' उसने विश्व को चुनौती दी है। चार सहस्र वर्षों से स्वाधीनता का भोग करने वाले काश्मीरी कभी बाहरी
शक्ति के सम्मुख न झुकने वाले काश्मीरी, शस्त्रों के सम्मुख कभी मस्तक नहीं झुकाये थे । (रा० १ : ३९)।
किन्तु उसने काश्मीरियों के उत्तरकालीन मोहता, पक्षपात, दुराग्रह, कलह, अर्थहीन, संघर्ष क्षुद्रता,
हृदयदौर्बल्य, सैनिकों की कायरता, विश्वासघात आदि का निःसंकोच वर्णन एवं निन्दा की है । ब्राह्मण
के दोषों की खुलकर निन्दा तथा राजपूतों के वीरता की प्रशंसा की है । ( रा० ३ : ४२५ ) देश के
चरित्र की राष्ट्रीय दुर्बलताओं का ध्यान रखते हुए भी उसे विश्वास था कि उसका काव्यमय इतिहास
तत्कालीन एवं भविष्य के राजाओं, देशभक्तों को कश्मीर के महान राजाओं का, महान व्यक्तियों में तथा
महान पूर्वजों की श्रेणियों में बैठाने योग्य बनायेगा ।
कश्मीर की सुरक्षा भावना के प्रति कल्हण विशेष जागरूक था । उसने यही संदेश दिया था—
'कश्मीर यदि अरक्षित हो गया तो सब कुछ नष्ट हो जायगा ।' अशोक जैसे सम्राट ने कश्मीर की म्लेच्छों से
रक्षा हेतु जलोक पुत्र की प्राप्ति के लिये तपस्या की थी । ( रा० १ : ७७ ) अलोक ने उज्जाट डिम्ब
स्थान पर म्लेच्छों का संहार किया था । ( रा० १ : ११६ ) कश्मीर ने यह सतर्कता त्याग दी तो उसे
सबकुछ से हाथ धोना पड़ा ।
इतिहास : इतिहास की महत्ता प्राचीन काल से रही है । वेदों का भाष्य करते समय ऋषियों ने
वार-वार प्राचीन 'ऐतिह्यो' पर ध्यान आकृष्ट किया है । विश्व के विद्वानो ने संस्कृत वाङ्मय की सर्वांग
परिपूर्णता से प्रभावित होकर उसकी प्रशंसा की है । किन्तु श्री कीथ आदि पाश्चात्य विद्वानो ने 'ऐतिह्य'
बुद्धि का भारतीयों में अभाव होना लिखा है । उनका मत है, प्राचीन भारत में इतिहास लिखने की पर-
म्परा नही थी । इतिहास के रूप मे लोग इतिहास से अपरिचित थे । किन्तु भारत में इतिहास का लक्षण
कुछ अपना था । उसके अनुसार इतिहास का प्रणयन होता रहा है ।
छान्दग्योपनिषद में नारद : सनत्कुमार संवाद मे इतिहास, पुराण पंचम वेद है । इस संकेत से
इतिहास अध्ययन की बात सुस्पष्ट कही गयी है । यास्क ने निरुक्त में 'इति ऐतिहासिका' कहकर पुरा वृत्तियों
का स्मरण किया है ।