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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 46, कुल 984 में से

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पृष्ठ 46

[ २७ ]

वेदों के आख्यानों में ऐतिहासिकता है । तिथि तथा वर्ष के अभाव में उसकी उपेक्षा कर दी जाती
है । प्राचीन काल में 'ऐतिह्य बुद्धि की सत्ता स्वीकार की गयी है । वही कालान्तर में परिवर्तित होकर इतिहास
के रूप में आज वर्त्तमान है ।
प्राचीन भारत में इतिवृत्त को रस के अनुकूल परिवृत्त कर काव्य के रूप में ग्रथित करने की प्रथा
थी । उनके परिणामस्वरूप अनेक ऐतिहासिक नाटक एवं महाकाव्यों की रचना की गयी । कौमुदी महोत्सव
से गुप्त कालीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है । बाण प्रणीत हर्षचरित में हर्ष के इतिहास का निर्विवाद
निर्णय प्राप्त होता है । प्रवरसेन का प्राकृत भाषा में ग्रथित ऐतिहासिक महाकाव्य सेतुबन्ध प्रख्यात काव्य
है । कान्यकुब्जाधिपति आश्रित वाक्पति राज ने ऐतिहासिक काव्य गउडवहो लिखा है। वादिराज ने यशोधर
चरित लिखा है । वह ऐतिहासिक एवं धार्मिक दृष्टि से सुन्दर काव्य है । कल्हण ने स्वयं शंखुक कृत भुव-
नाभ्युदय का उल्लेख किया है। यह अप्राप्य ग्रन्थ है । उसमे मम्मोट्पल के युद्ध का सुन्दर वर्णन है । पद्मगुप्त
परिमल का नव साहसांक चरित ऐतिहासिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है। हेम चन्द्र का 'द्वयाश्रय' काव्य
ऐतिहासिक है। मंखक का श्री कंठ चरित तथा जल्हण प्रणीत सोमपाल चरित इतिवृत्त परक काव्य है ।
रामपाल चरित, विक्रमांकाभ्युदय चरित, पृथ्वीराज विजय, जयन्त विजय, सुकृत संकीर्तन, हम्मीर मद मर्दन,
वसन्त विलास, सुरथोत्सव, कीर्ति कौमुदी, भोट्टपराज, चन्द्रप्रभा आदि ग्रन्थो में प्रचुर ऐतिहासिक सामग्री
मिलती है । इस प्रकार इतिहास को आधारभित्ति बनाकर काव्य की रचना करने वाले कवियों की एक
विशाल परम्परा है । ऐतिहासिक महाकाव्य के प्रणेताओं में महाकवि विल्हण का नाम उल्लेखनीय है । उसने
चालुक्य वंशीय विक्रमादित्य षष्ठ को अपने महाकाव्य का नायक बनाकर अमर कर दिया है ।
इतिवृत्त मिश्रित काव्यकर्ता अनेक हुये हैं । किन्तु इतिवृत्त को प्रधान बनाकर रचना करने वाले
और तिथि वर्ष का सम्यक् उल्लेख करने वाले कवियों की परम्परा कुछ क्षीण रही है। जो थे उनके ग्रन्थ
अबतक प्रकाश में नहीं आये हैं। उनका केवल नाम मात्र अवशिष्ट है । राजतरंगिणी एक सच्चे इतिहास-
कार की कृति है । कल्हण सहृदय कवि है । उसने इतिहास को भी पूर्ण रूपेण काव्यमय बनाने का
प्रयास किया और सफल हुआ है। यदि कवि की प्रतिभा का मूल्यांकन किया जाय कि वह कहाँ तक कवि है
और कहाँ तक इतिहासकार तो किसी एक निश्चय पर पहुँचना कठिन प्रतीत होता है । कवि एवं इतिहास-
कार जिस दृष्टि से विचार किया जाय कल्हण को दोनों में पारंगत पाते हैं। यह ऐतिहासिक एवं महाकाव्य-
कार दोनों है । उसका योगदान महत्त्वपूर्ण है । उसने राजाओ के काल, समय एवं स्थानो को जो अस्थिर
थे, अनियमित थे, निश्चित नहीं थे, उन्हें निश्चित एवं स्थिर किया है । पाठकों की उदात्त भावनाओं को
जागृत किया है। उसने नीति वचनों या प्रयोग कर काव्य को हलका बनाने की अपेक्षा गम्भीर एवं
उपदेशात्मक बना दिया है ।
कल्हण ने वेद की इस महत्त्वपूर्ण परंपरा मे रचना का उत्तरदायित्व उठाया था। उसकी आरम्भ
की गयी परम्परा आगामी पाँच शताब्दियों तक चलती रही। उसने जिस तरंगिणी को जीवन दिया था उसे
जोनराज, श्रीवर, प्रजाभट्ट एवं शुक काश्मीर में प्रथम बार विदेशी मुगल शासन स्थापित होने तक कायम
रखे । विश्व इतिहास में ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि इतिहास लिखने की परम्परा एक ही पुस्तक
या लेखन-क्रम पाँच शताब्दियों तक अविच्छिन्न गति से चलता रहा। यह तरंगिणी उसी समय सूखी जब
काश्मीर की स्वाधीनता भी सूख गयी ।
कौटिल्य की परिभाषानुसार राजतरंगिणी इतिहास है। कौटिल्य ने इतिहास में पुराण, इतिवृत्त,