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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 464, कुल 984 में से

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पृष्ठ 464

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प्रथम तरंग ३४५

[Left Column]
उसको बहुत भूख लगी। मार्ग में एक स्त्री को
दूध लिये जाते देखा। दूध मांगा। स्त्री ने कहा।
पर्वत से नीचे उतरिए। दूध दूंगी। उत्तर मिला।
शक्ति नहीं है जो पर्वत से उतर सकूं। स्त्री ने
उत्तर दिया। शक्ति कैसे होगी। तुम शक्ति में
विश्वास नहीं करते। वेदान्ती को बात लग गयी।
शक्ति में विश्वास करने लगे। 'सौन्दर्य लहरी'
जैसे प्रसिद्ध ग्रन्थ की रचना शक्ति की प्रशंसा एवं
स्तुति में की।
मन्दिर पतला है। इसका अधिष्ठान २० फुट
ऊँचा है। यह १३ परत शिलाखण्डों का बना है।
चारो कोणों पर तीन कोणाकार अधिष्ठान बना है।
बौद्ध शैली के आधार पर बौद्ध लोग इसे अपना
पवित्र मन्दिर मानते हैं। यहां मन्दिर का बाह्य रूप
है। कोणाकार रूप के कारण जो बौद्ध स्तूपों में पाया
जाता है, कुछ लोगों का मत है यह बौद्ध मन्दिर था।
मन्दिर का बाहरी चौतरा ३३ फुट चौड़ा है।
उसपर मुंडेरा तुल्य बनावट मन्दिर के अष्टभुजीय रूप
को प्रकट करता है। मन्दिर के चबूतरे पर पहुंचने
के लिए तीन वर्गों में पत्थर सीढ़ियां की बनी हैं।
पहला ६, दूसरा ७ तथा तीसरा १८ सीढ़ियो का
बना है। अट्ठारह सीढ़ियो वाली चढ़ान दोनो ओर से
दिवालों द्वारा बन्द है। इसके पश्चात् १० सीढ़ियों
से चढ़ने पर मन्दिर के द्वार तक पहुँचा जा सकता
है। मन्दिर का गर्भगृह गोलाकार है।
अर्घा में एक बड़ा लिंग है। मन्दिर का शिखर
२५ फुट ऊँचा है। यह चबूतरे में ५ फीट ऊँचाई पर
है। चबूतरे का परिवेश १०० फुट होगा। मन्दिर
का व्यास १४ फिट है। छत ११ फुट ऊँचाई से
आरम्भ होती है। छत के आधार तुल्य चारों कोनों
पर चार अठपहले स्तम्भ है। दिवाल ७½ फुट मोटी
है। सम्पूर्ण मन्दिर शिलाखण्डों अर्थात् पत्थर का
बना है।
मन्दिर की शिल्पकला का नाम कश्मीरी हिन्दू
कला दिया जा सकता है। यह मन्दिर बंगाल के
४४

[Right Column]
मन्दिरों के शिल्पकला के आकार तथा रूप से कुछ
मिलता है।
कर्नल कोल ने मन्दिर का प्लान पृष्ठ १-८८
पर दिया है। शिव लिंग के चारों तरफ लपटे हुए
सर्प की बात कही गयी है। मुझे सर्प तुल्य कोई वस्तु
लिंग से लिपटी हुई नहीं दिखाई पड़ी। सम्भव है।
प्राचीन शिवलिंग के स्थान पर नवीन शिव लिंग की
स्थापना मन्दिर के जीर्णोद्धार के समय की गयी है।
कैप्टन थी नाइट लिखता है : (सन् १८६१ ई०) यह
भूमि से एक हजार फुट ऊँचा है। कहा जाता है कि
अशोक के पुत्र जलोक ने इसका निर्माण कराया था-
इस मन्दिर का प्लान अठपहला अर्थात् अष्टकोणीय
है। प्रत्येक पहल १५ फिट लम्बा है। मन्दिर में १५
सीढ़ियां चढ़कर पहुंचा जाता है। प्रत्येक सीढ़ी आठ
फिट चौड़ी है। उसके दोनो तरफ बाजूआ दीवालें
है। मन्दिर की दीवाल आठ फुट चौड़ी है। यह एक
सब से बड़ा प्रमाण है कि वह मन्दिर बहुत पुराना
था। (एपिएिडक्स ए. पृष्ठ ३५४ (१८६१)
वह मन्दिर के विषय में लिखता है-मन्दिर इस समय
दो हिन्दू साधुओं की संरक्षता में है। यहां मैने दो बड़े
गन्दे फकीरों अथवा धार्मिक साधुओं को देखा। उनमें
एक सो रहा था। उसका पैर धूल तथा भस्म में पड़ा
था, दूसरा अविचल बैठा था। उसकी एक भी मांस-
पेशियां तक हिल नहीं रही थीं। वह प्रातःकालीन
सूर्य में धूप खा रहा था। दोनों प्रायः नंगे थे। उनके
शरीर पर तथा मुख पर राख पुती हुई थी। उनके
बाल लम्बे और जटा का रूप ले लिये थे। वे दोनों
जगत् से जैसे सम्बन्ध तोड़ चुके थे। मैं वहाँ पर था।
परन्तु उनमें से किसी ने मेरी तरफ न तो देखा और
न ध्यान दिया। उन्हें मेरी उपस्थिति का जैसे ज्ञान
भी नहीं था। यद्यपि मैने उनमें से एक का स्केच
किया। दोनों की तरफ बहुत देर तक इस प्रकार
ध्यान पूर्वक देखता रहा जैसे किसी चिड़ियाघर •
में कोई नया जानवर आया हो परन्तु उन्हें जैसे इन
सबका कोई ज्ञान ही नहीं था।