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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 984 में से

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पृष्ठ 422

प्रथमं तरंगः ३३१
व्यावृत्य चोलकर्णाटलाटादींश्च नरेश्वरान् ।
सिन्धुरानिव गन्धेभो गन्धेनैव व्यदारयत् ॥ ३०० ॥
३००. लौटकर उसने मार्ग में चोल१, कर्णाट२, लाटादि३ के नरेशों को परास्त कर दिया;
जैसे गजराज मदगन्ध से ही हाथियों को तितर बितर कर देता है ।
ममा' तथा 'सविउदया' और 'मार्ताण्ड' का 'मार्तण्ड'
पाठभेद मिलता है ।
पादटिप्पणियाँ :
२९९ (१) यमुपदेव : यह वस्त्र क्या था
ठीक से पता नहीं चलता । मार्तण्ड अर्थात् सूर्य का
उल्लेख यहाँ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक दृष्टि से है ।
मिहिरकुल तथा उसके पिता दोनों की मुद्राओं पर सूर्य
आकृति अंकित मिलती है । प्रतीत होता है, राजा
शिव भक्त था । सूर्य का उपासक था । सिंहल राजा
के हेमपादांकित चिन्ह के स्थान पर उसने 'सूर्यांकित'
वस्त्र का प्रचलन किया । रानी के कुच पर उसने
सिंहल राजापादांकित चिन्ह देखा था । उसके स्थान
गोल उत्तुंग कुच पर उगता गोल सूर्य रश्मि तुल्य
वस्त्र लगाना अधिक कलात्मक मालूम होता है ।
स्तनों पर पश्चिमीय देशों के रंगमंच पर स्त्रियों को
इस प्रकार का गोल जरी का काम किये वस्त्र पहने
देखा है ।
पाठभेद :
श्लोक संख्या ३०० में 'लाटादींश्च' का 'लोटा-
दींश्च' तथा 'व्यदारयत्' का 'व्यधारयत्' पाठभेद
मिलता है ।
३०० (१) चोल : आधुनिक तंजोर तथा
त्रिचनापल्ली तथा पुडुकोट्ट के कुछ भागों को
मिलाकर प्राचीन चोल मण्डल प्रायः बन जाता है ।
चोल राज्य पूर्वीय सागर तट पर पेन्नार नदी
से वेल्लार तथा पश्चिम में कुर्ग तक विस्तृत था ।
यह भी मत है । वेल्लारु नदी के उत्तर दक्षिण (एक
ही नाम की दो नदियाँ हैं) पूर्व में समुद्र तथा
पश्चिम में कोट्टाईक्कराप तक फैला था। वर्तमान
त्रिचनापल्ली, तंजोर तथा पुदुक्कोट्टइ का कुछ भाग
सम्मिलित था । इसकी राजधानी 'उरगपुर' अथवा
उरैयूर अर्थात् प्राचीन त्रिचनापल्ली थी । कवि दण्डी
ने अपने काव्यादर्श में चोल देश का उल्लेख किया
है । कावेरीपट्टनं कावेरी नदी के उत्तर इस राज्य
का बड़ा बन्दरगाह था । कांची अर्थात् वर्तमान
कांजीवरम चोल प्रदेश का एक विशाल नगर था ।
नागपट्टम अर्थात् नाडीपत्तनम भी इसका एक बन्दर-
गाह था । यह बन्दरगाह आज भी चालू है । मैं यहाँ
दो बार आ चुका हूँ । समुद्र उथला होने के कारण
जहाज दो मिल दूर ठहरते हैं ।
तंजोर, त्रिचनापल्ली, कुम्भकोनम पूर्वकालीन
चोल राज्य के प्रसिद्ध नगर हैं। ग्यारहवीं तथा
बारहवीं शताब्दी में गंगाई कोण्डा चोलपुरम चोल
राज की राजधानी थी। दक्षिण भारत के अभिलेखों
में कावेरी नदी का नाम चोल भी दिया गया है ।
चोल देश तथा देशवासी दोनों के लिए आया है ।
(सभा पर्व ५२:३५) ।
मार्कण्डेय (५७:४५), वायु (४५:५:१२४)
मत्स्य पुराणों (११२:५:४६) में चोल राज्य का
नाम पाण्ड्य तथा केरल के साथ आया है। इसके
अतिरिक्त पद्म पुराण (३०, १०८, १०९) स्कन्द
पुराण (२:४.२६-२७) में भी उल्लेख मिलता है ।
रामायण किष्किन्धा काण्ड (४१:१२) में चोल
का उल्लेख आन्ध्र, पुण्ड्र, पाण्ड्य, केरल के साथ
किया गया है। उसकी दिशा दक्षिण बतायी गयी
है । कावेरी नदी का उल्लेख इसी स्थल पर किया
गया है ।
महाभारत सभा पर्व (२७:२१) में उल्लेख
है कि अर्जुन ने चोल सेना पर विजय प्राप्त की
थी । भीष्म पर्व (९:६० तथा ५०:५१) में उल्लेख