राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
पृष्ठ 376, कुल 984 में से
संदर्भ में पढ़ेंप्रथम तरंग २७५
एकहस्तधृतावेगस्रस्तशीर्षांशुकांतया ।
तया पाणिसरोजेन धावित्वा सोऽथ ताडितः ॥ २४८ ॥
२४८. वेग से आने के कारण शीर्षांशुक सर से खिसक गया था। उसके छोर को एक हाथ
से पकड़े उसने दूसरे पाणि सरोज से दौड़कर उसे (अश्व को) मारा।
भोज्यमुत्सृज्य यातस्य फणिस्त्रीस्पर्शस्तस्ततः ।
सौवर्णी पाणिमुद्राऽङ्के तुरगस्योदपद्यत ॥ २४६ ॥
२४६. भोज्य को त्याग कर जाते हुए तुरग के अंग पर फणि स्त्री के स्पर्श से सोवर्णी पाणि
मुद्रा अंकित हो गयी।
तस्मिन्काले नरो राजा चारैस्तां चारुलोचनाम् ।
श्रुत्वा द्विजवधू ं तस्थौ प्रागेवाऽङ्कुरितस्मरः ॥ २५० ॥
२५०. उस समय राजा नर के मन में चारुलोचना द्विज वधू के प्रति अनुराग अंकुरित
हो गया, जिसके सौंदर्य के विषय में वह अपने गुप्तचरों से पूर्व ही सुन चुका था।
[बायाँ स्तम्भ]
कल्हण ने पति देवता शब्द का प्रयोग यहाँ किया
है। पतिव्रता स्त्रियाँ पति को देवता मानती हैं। पति
भक्ति उनका धर्म माना गया है। कल्हण आर्यों की
इस परम्परा का यहाँ उल्लेख करता है।
२४६ (१) धान्य : धान्य का शाब्दिक अर्थ धान
होता है। धान कूटने और भूसी निकल जाने पर
चावल हो जाता है। धान्य का राजतरंगिणी में
सर्वत्र अर्थ चावल धान्य किंवा शाली किया गया है।
२४७ (१) शिञ्जानमंजुमंजीरा : यहाँ
पर इस वाक्य का अनुवाद न कर यथावत् रख
दिया है ताकि मूल भाव का रस प्राप्त हो सके।
यह शब्द कवि कल्हण के साहित्य मर्मज्ञता का परि-
चायक है। भूषणों की मधुर ध्वनि के लिये शिञ्जित
शब्द का प्रयोग प्रशस्त कहा गया है। 'भूषणानां तु
शिञ्जितम्' । 'ङ्क' 'ञ्ज' का प्रचुर प्रयोगमाधुर्य का
व्यंजक है।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २४८ में 'एकहस्त' का पाठभेद
'एकहस्ते' मिलता है।
पादटिप्पणियाँ :
२४८(१) शीर्षांशुक : शाब्दिक अर्थ शिर छोड़ने
का वस्त्र होता है। शिरोधान भी कहते हैं। कश्मीर में
[दायाँ स्तम्भ]
इसे तरंगा कहते हैं। हरवान विहार के खनन कार्य
में मिट्टी की टाइल्स तथा खिलोने मिले हैं। तृतीय
शताब्दी के शिरोवेश किंवा शीर्षांशुक के रूप तथा
प्रकार का ज्ञान होता है।
हरवान के एक टाइल पर नृत्यशील एक रमणी
का चित्र उभड़ा अंकित है। वह पैरों में या तो शल-
वार पहनी है या पाजाम। शरीर पर कुरता है।
कुरता की बाँहें ढीली नहीं है। कानो में बाला है,
लम्बे केश जूड़ा में बँधे हैं। शिर पर दुपट्टा की तरह
वस्त्र हैं। वह दोनों हाथो में शिरो भाग से वाम
कर में नीचे जानु तक तथा दक्षिण कर में स्कन्ध
प्रदेश तक उठा है। उसका वाम पद सीधा तथा
दक्षिण पद उठा है। वह वाम दिशा की ओर देख
रही है। यह टाइल अत्यन्त भावनामय प्रभावो-
त्पादक होने के साथ ही साथ तत्कालीन वेश भूषा
पर प्रकाश डालती है। उसमें प्रकट होता है कि उस
समय का कश्मीर समाज वेशभूषा में कितना
सुसंस्कृत तथा आगे बढ़ चुका था। इस टाइल के
चौखूंटे पर गोले गोले बिन्दु धंसे तथा उभड़े हैं।
पाठभेद :
श्लोक संख्या २४९ में 'शङ्के' का पाठभेद
'शंके' मिलता है।