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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 374, कुल 984 में से

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पृष्ठ 374

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प्रथम तरंग
एकहस्तधृतावेगस्रस्तशीर्षांशुकान्तया ।
तया पाणिसरोनेन धावित्वा सोऽथ ताडितः ॥ २४८ ॥
२४८. वेग से आने के कारण 'शीर्षांशुक' सर से खिसक गया था। उसके छोर को एक हाथ
से पकड़े उसने दूसरे पाणि सरोज से दौड़कर उसे (अश्व को) मारा।
भोज्यमुत्सृज्य यातस्य फणिस्त्रीस्पर्शत्तस्ततः ।
सौवर्णी पाणिमुद्राङ्के तुरगस्योदपद्यत ॥ २४६ ॥
२४६. भोज्य को त्याग कर जाते हुए तुरग के अंग पर फणि स्त्री के स्पर्श से सौवर्णी पाणि
मुद्रा अंकित हो गयी।
तस्मिन्काले नरो राजा चारैस्तां चारुलोचनाम् ।
श्रुत्वा द्विजवधू् तस्थौ प्रागेवाङ्कुरितस्मरः ॥ २५० ॥
२५०. उस समय राजा नर के मन में चारुलोचना द्विज वधू के प्रति अनुराग अंकुरित
हो गया, जिसके सौंदर्य के विषय में वह अपने गुप्तचरों से पूर्व ही सुन चुका था।
कल्हण ने पति देवता शब्द का प्रयोग यहाँ किया इसे तरंगा कहते है। हरवान विहार के खनन कार्य
है। पतिव्रता स्त्रियाँ पति को देवता मानती हैं। पति में मिट्टी की टाइल्स तथा खिलोने मिले हैं। तृतीय
भक्ति उनका धर्म माना गया है। कल्हण आर्यों की शताब्दी के शिरोवेश किंवा शीर्षांशुक के रूप तथा
इस परम्परा का यहाँ उल्लेख करता है। प्रकार का ज्ञान होता है।
२४६ (१) धान्य: धान्य का शाब्दिक अर्थ धान हरवान के एक टाइल पर नृत्यशील एक रमणी
होता है। धान कूटने और भूसी निकल जाने पर का चित्र उभड़ा अंकित है। वह पैरों में या तो शल-
चावल हो जाता है। धान्य का राजतरंगिणी में वार पहनी है या पाजाम। शरीर पर कुरता है।
सर्वत्र अर्थ चावल धान्य किंवा शाली किया गया है। कुरता की बाँहें ढीली नही है। कानो में बाला हैं,
२४७ (१) शिञ्जानमंजुमंजीरा : यहाँ लम्बे केश जूड़ा में बँधे हैं। सिर पर दुपट्टा की तरह
पर इस वाक्य का अनुवाद न कर यथावत् रख वस्त्र हैं। वह दोनों हाथों में शिरो भाग से वाम
दिया है ताकि मूल भाव का रस प्राप्त हो सके। कर में नीचे जानु तक तथा दक्षिण कर में स्कन्ध
यह शब्द कवि कल्हण के साहित्य मर्मज्ञता का परि- प्रदेश तक उठा है। उसका वाम पद सीधा तथा
चायक है। भूषणों की मधुर ध्वनि के लिये शिञ्जित दक्षिण पद उठा है। वह वाम दिशा की ओर देख
शब्द का प्रयोग प्रशस्त कहा गया है। 'भूषणानां तु रही है। यह टाइल अत्यन्त भावनामय प्रभावो-
शिञ्जितम्' । 'ङ्' 'ञ्ज' का प्रचुर प्रयोगमाधुर्य का त्पादक होने के साथ ही साथ तत्कालीन वेश भूषा
व्यंजक है। पर प्रकाश डालती है। उसमें प्रकट होता है कि उस
पाठभेद: समय का कश्मीर समाज वेशभूषा में कितना
श्लोक संख्या २४८ में 'एकहस्त' का पाठभेद सुसंस्कृत तथा आगे बढ़ चुका था। इस टाइल के
'एकहस्ते' मिलता है। चौखूंटे पर गोले गोले चिन्ह धँसे तथा उभड़े है।
पादटिप्पणियाँ : पाठभेद :
२४८(१) शीर्षांशुक : शाब्दिक अर्थ शिर तोपने श्लोक संख्या २४९ में 'द्राङ्के' का पाठभेद
का वस्त्र होता है। शिरोधाम भी कहते हैं। कश्मीर में 'द्राके' मिलता है।