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राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)

Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation

महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा

DevanagariHindipublished984 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 984 में से

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पृष्ठ 365

२६८ राजतरङ्गिणी
अभिमानवतां ब्रह्मन्नुक्तायुक्तविवेकिनाम् ।
युज्यतेऽवश्यभोग्यानां दुःखानामप्रकाशनम् ॥ २२६ ॥
२२६. 'ब्रह्मन्' ! स्वाभिमानी युक्तायुक्तविवेकी जन अवश्यमेव भोग्य दुःखों को प्रकाशित
करना ठीक नहीं समझते ।
परदुःखं समाकर्ण्य स्वभावसुजनो जनः ।
उपकारसमर्थत्वादप्राप्नोति हृदयव्यथाम् ॥२२७ ॥
२२७. 'स्वभावतः सज्जन जन, पर दुःख सुनकर उपकार करने में असमर्थ होने के कारण
हार्दिक व्यथा का अनुभव करते हैं ।
वृत्तिं स्वां बहु मन्यते हृदि शुचं धत्तेऽनुकम्पोक्तिभि-
र्व्यक्तं निन्दति योग्यतां मितमतिः कुर्वन्स्तुतोगत्मनः ।
गर्ह्योपायनिषेवणं कथयति स्थास्नुं यदन्यापदं
श्रुत्वा दुःखमरंतुदां वितनुते पीडां जनः प्राकृतः ॥ २२८ ॥
२२८. मितमति साधारण जन दुखियों के दुःख को सुनकर, आत्मश्लाघा करता हुआ,
उनकी अपेक्षा अपनी वृत्ति श्रेष्ठ समझता है । तथापि हृदय में शोक धारण करता हुआ, सहानुभूति
पूर्ण वचनों से उनकी योग्यता की स्पष्ट निन्दा करता है । दुःख निवृत्ति निमित्त कुत्सित उपायों के
आश्रय की मन्त्रणा देता है ।
अत एव विवेक्तॄणां यावदायूः स्वमानसे ।
जीर्णानि सुखदुःखानि दहन्त्यन्ते चिताऽनलः ॥ २२९ ॥
२२९. अतएव विवेकियों के मन में आजीवन जीर्ण हुए सुख-दुःख अन्त में चितानल ही
जलाते हैं ।
अर्थात् वायु जिसका भोजन है उसे नाग कहते हैं । श्लोक संख्या २२८ में 'मति.' का 'मतेः';
सर्प हवा पीकर रहते हैं यह आम कहावत है । 'स्तुतोरा' का 'स्तुतेरा'; 'निषेवण' का 'निषेवन' तथा
'जनः' का 'पुनः' पाठभेद मिलता है ।
२२६ (१) दुःखः कल्हण का यह श्लोक अत्यन्त
मार्मिक है । उसने स्वाभिमानी और विवेकी लोगों पादटिप्पणियाँ :
के चरित्र का चित्रण किया है । वे भाग्य विपर्यय के
कारण आये हुए दुःखों को चुपचाप सह लेते हैं । उसे २२८ (१) यह शार्दूल विक्रीडित छन्द है ।
प्रकट करने का किंचित् मात्र प्रयास नहीं करते । इसका लक्षण निम्न प्रकार से है ।
इसी भाव को कवि रहीम व्यक्त करता है । सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम् ।
रहिमन निज मन को व्यथा मन ही राखो गोय ।
सुनि अठिलैहैं लोग सब बाँटि न लैहै कोय ॥ पाठभेद :
पाठभेद : श्लोक संख्या २२९ में 'विवेक्तॄणां' का 'विव-
श्लोक संख्या २२७ में 'समाकर्ण्य' का 'यदा क्तृणां', 'जीर्णानि' का 'दीर्घानि' तथा 'दीर्घाणि'
कर्ण्य' तथा 'स्वभाव' का 'सुभाव' पाठभेद मिलता है । और 'चितानलः' का 'चितानिलः' पाठभेद मिलता है ।