राजतरंगिणी (महाकवि कल्हण - सम्पूर्ण काश्मीर व भारत राजवंश इतिहास)
Rajatarangini of Kalhana with Hindi Translation
महाकवि कल्हण / पं. रघुनाथ सिंह द्वारा
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शाला, जनाश्रय, विद्यावेश्म : कल्हण ने आरोग्यशाला ( रा० ३ : ४६१ ) तथा जनाश्रय
( रा० ३ : ४८० ) का उल्लेख किया है । प्रथम वर्त्तमान काल के अस्पतालों तथा द्वितीय धर्मशालाओं के
सदृश थे । चतुःशाला ( रा० ३ : १३ ) का भी उल्लेख किया गया है । उसका निर्माण बौद्ध संघ तथा
भिक्षुओं के निवास हेतु किया गया था । बौद्ध उपासकों के लिए भी विहार बने थे । विद्यावेश्म आजकल के
छात्रावास सहित विद्यालयों के समान थे । वहाँ विद्वानों, विद्यार्थियों के निवास के साथ पढ़ने तथा भोजनादि
का प्रबन्ध था ।
मठ, अक्षयिणी, प्रतिष्ठान, सत्र : कल्हण ने मठों का उल्लेख बहुत किया है । साधु-सन्तों के लिए
मठ-निर्माण किया जाता था । शुष्कलेत्र क्षेत्र में मठ ( रा० १ : १७० ), चतुःशाला मठ ( रा० १ : १९१ )
पाशुपत मठ ( रा० ३ : ४६० ) ब्रह्ममठ ( रा० ३ : ४७६ ) मध्यमठ ( रा० १ : ३०० ) सेरी मठ
( रा० १ : ३०० ) खेडा, भीया मठ ( रा० २ : १३५ ) मेध मठ ( रा० ३ : ४६० ) राजाओं द्वारा
स्थापित किये गये थे । कालान्तर में मठ बनाने का प्रचलन बहुत हो गया था । दिद्दा मठ आदि अपने समय
के प्रसिद्ध मठ थे । मठों के निर्माण का सम्बन्ध तृतीय तरंग तक केवल शैव सम्प्रदाय से था । कल्हण ब्रह्म
मण्डप का रानी रण रम्भा द्वारा स्थापित होने का उल्लेख करता है । ( रा० ३ : ४५९ ) यह ब्रह्मविदों के
लिए निर्माण किया गया था । राजा तथा धनी जन आप अक्षयिणी ( रा० १ : ३४७ ) प्रतिष्ठान ( रा०
१ : ३४७ ) तथा सत्र ( रा० २ : ५८ ) पथिकों, यात्रियों तथा भूखों के लिए स्थापित कराते थे । जीर्णो-
द्वार कराने का भी उल्लेख मिलता है । सम्राट् अशोक ने विजयेश्वर के नवीन पाषाण प्राकार का निर्माण
कराया था । ( रा० १ : १०५ ), कल्हण ने यागोत्सव ( रा० १ : ३३१ ) तथा लिंग अर्चनोत्सव ( रा०
२ : १३५ ) का उल्लेख किया है ।
नगर निर्माणानि : कल्हण काश्मीर के नगरों तथा ग्रामों का वर्णन कर उनके स्थानों का ठीक
पता देता है । तरंग प्रथम से तीन तक कम-से-कम १७ नगर निर्माणों का उल्लेख किया गया है । राजा
लव ने लोलोर ( रा० १ : ८६ ) सुरेन्द्र ने सोरक पत्तन, ( रा० १ : ९३ ) अशोक ने श्रीनगर ( रा०
१ : १०४ ) जलोक ने उज्जट डिम्ब ( रा० १ : ११६ ) हुष्क ने हुष्कपुर, जुष्क ने जुष्कपुर, जय स्वामीपुर,
( रा० १ : १६९ ), सम्राट कनिष्क ने कनिष्कपुर ( रा० १ : १६८ ), अभिमन्यु ने अभिमन्युपुर, वितस्ता
पुलिन में नगर ( रा० १ : १७५-२०२ ), हिरण्याक्ष ने हिरण्याक्षपुर ( रा० १ : २८७ ), मिहिर कुल ने
हिरण्यपुर, मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने लवणोत्स ( रा० १ : ३२९ ), तुंजीन ने कतिका
पत्तन, ( रा० २ : १४ ) विजय ने विजयेश्वर को नगर से घिरवाया था । ( रा० २ : ६२ ) । नगरों के
लिए पुर तथा पत्तन शब्द समानार्थक हैं । तीनों शब्दों का प्रयोग कल्हण ने किया है ।
ग्रामों का भी उल्लेख किया गया है । उनके स्थानों का पता कल्हण के वर्णनों से मिल जाता है ।
राजा अक्ष ने अक्षबल ( रा० १ : ३३८ ) मेघ वाहन ने मयुष्ट ग्राम ( रा० ३ : ८ ) तथा भेडर ग्राम
( रा० ३ : ४८१ ) का दान किया था ।
मन्दिरों से काश्मीर मण्डल मण्डित था । प्रत्येक ग्राम तथा जनस्थान में मन्दिर थे । राजा अशोक
ने अशोकेश्वर ( रा० १ : १०५ ), जलोक ने ज्येष्ठेश्वर भूतेश ( रा० १ : ४८), अभिमन्यु ने शशांक शेखर,
( रा० १ : १७५ ) मिहिर कुल ने मिहिरेश्वर ( रा० १ : ३०६ ), बक ने वकेश ( रा० १ : ३२६ ),
गोपादित्य ने गोपाद्रि पर ज्येष्ठेश्वर, ( रा० १ : ३४१ ) गोकर्ण ने गोकर्णेश्वर ( रा० १ : ३४६ ), उग्र ने
उग्रेश ( रा० १ : ३४८ ), तुंग ने तुंगेश्वर ( रा० २ : १४ ), सन्धिमति ने सन्धेश्वर, इष्टेश्वर
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